इंदौर में एक नायब तहसीलदार जब मांग सकता है 50 लाख रुपए की रिश्वत, फिर एडीएम, एसडीएम और कलेक्टर का रेट क्या होगा?

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इंदौर। कलेक्टर ने 50 लाख की रिश्वत मांगने वाले नायब तहसीलदार नागेन्द्र त्रिपाठी पर कार्रवाई तो शुरू कर दी है, लेकिन इससे पूरा प्रशासन ही शंका के घेरे में आ गया है। लोग सवाल कर रहे हैं कि जब एक नायब तहसीलदार 50 लाख की रिश्वत मांग सकता है तो एडीएम, एसडीएम और कलेक्टर का रेट क्या होगा? लोगों का कहना है कि यह मामला पकड़ा गया तो सामने आया, लेकिन ऐसे कई मामले भी होंगे, जो उजागर नहीं हुए। इसका मतलब साफ है कि प्रशासन में जमकर भ्रष्टाचार चल रहा है।

उल्लेखनीय है कि पिता की जमीन के फौती नामांतरण पर नायब तहसीलदार ने आवेदक से 50 लाख रुपए मांगे थे। नायब तहसीलदार की तरफ से पटवारी ने रेसीडेंसी कोठी पर आवेदक को जब रिश्वत की राशि सुनाई तो वह आश्चर्य में पड़ गया। बाद में आवेदक के वकील ने कलेक्टर को फोन लगाकर सबूत सहित घटनाक्रम की जानकारी दी। कलेक्टर आशीष सिंह ने तहसील मल्हारगंज के नायब तहसीलदार नागेन्द्र त्रिपाठी पर कार्रवाई की अनुशंसा संभागायुक्त से की थी। कलेक्टर ने कहा था कि नायब तहसीलदार को निलंबित कर उसके खिलाफ विभागीय जांच की जाए। गुरुवार को संभागायुक्त दीपक सिंह ने नायब तहसीलदार नागेन्द्र त्रिपाठी को निलंबित कर दिया है ।

सरकारी जमीन को निजी करने का भी मामला

कलेक्टर आशीष सिंह द्वारा नायब तहसीलदार त्रिपाठी के संबंध में प्राप्त शिकायत पर अनुविभागीय अधिकारी राजस्व मल्हारगंज को जांच करने के निर्देश दिये गये थे। बताया जाता है कि जाख्या स्थित भूमि के नामान्तरण में पटवारी के माध्यम से एक आवेदिका के फौती नामान्तरण के प्रकरण में नायब तहसीलदार नागेन्द्र त्रिपाठी, तहसील मल्हारगंज द्वारा राशि की मांग किए जाने संबंधी शिकायत प्राप्त हुई थी। जांच में त्रिपाठी की भूमिका सन्देहास्पद पाई गई है। त्रिपाठी द्वारा बिना स्थल निरीक्षण किए मात्र पटवारी द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन के आधार पर शासकीय भूमि से निजी खातेदार को नवीन मार्ग उपलब्ध कराया गया। भूमि शासकीय होने से भूमि में शासन का हित निहित था, इसकी जिम्मेदारी तहसीलदार की थी।

बिना रिश्वत कलेक्टोरेट में नहीं हो रहा काम

कलेक्टर आशीष सिंह की सख्ती के बावजूद कलेक्टर कार्यालय में आम लोग महीनों चक्कर लगाते रहते हैं, लेकिन उनका काम नहीं होता। फिर किसी बाबू या दलाल के माध्यम से रिश्वत देने पर तुरंत काम हो जाता है। एक समय था जब दलालों को कलेक्टोरेट से बाहर कर दिया गया था, लेकिन अब फिर से दलाल सक्रिय हैं। अगर आप कलेक्टर ऑफिस में इधर-उधर देखते घूमते रहें तो कई लोग आकर पूछने लगते हैं कि क्या काम है? कई बार तो ऐसा लगता है कि आप कपड़ा मार्केट या सराफा में घूम रहे हैं, जहां दुकानदार के एजेंट आपसे पूछने लगते हैं कि क्या खरीदना है।

सीएम के प्रभार वाले जिले में यह हाल

लोगों का कहना है कि जब सीएम के प्रभार वाले जिले इंदौर में यह हाल है तो प्रदेश के बाकी जिलों में क्या होता होगा? यहां तो इस बात का डर भी रहता है कि सीएम तक बात पहुंच जाए तो नौकरी जा सकती है, लेकिन कलेक्टोरेट में अधिकारी और कर्मचारी बिना डरे भ्रष्टाचार में जुटे हैं। इसका मतलब साफ है कि उन्हें न तो वरिष्ठ अधिकारियों का डर है और न ही उन पर कोई निगरानी रखी जा रही है।

आम जनता त्रस्त, अधिकारी मस्त

कलेक्टोरेट में लंबे समय से भ्रष्टाचार का सिलसिला चल रहा है। नए कलेक्टर आते हैं, बैठकों में डांट-डपट होती है, फिर सब कुछ पुराने ढर्रे पर चलने लगता है। काफी काम ऑनलाइन हो गए हैं, उसमें भी रिश्वत का बोलबाला है। ईडब्ल्यूएस सर्टिफिकेट, जाति प्रमाण पत्र आदि बिना दलालों के बना पाना संभव नहीं। कई बार सरवर की खराबी से लेकर डाक्यूमेंट में मीन-मेख निकालकर लोगों को भगा दिया जाता है, लेकिन अगर आप किसी दलाल के माध्यम से जाते हैं तो काम तत्काल बन जाता है।

सबसे साफ शहर की इस गंदगी की सफाई जरूरी

देश में सात बार नंबर वन आने वाले इस शहर से भ्रष्टाचार रूपी गंदगी की सफाई भी जरूरी है। पहले सिर्फ पुलिस ही बदनाम थी, लेकिन अब प्रशासन भी पीछे नहीं है। सीएम डॉ.मोहन यादव को खुद संज्ञान लेकर इस प्रशासनिक गंदगी की सफाई करवानी चाहिए। वर्ना प्रेस कान्फ्रेंस और बैठकों में लाख दावे होते रहेंगे, काम तो इन्हीं को करना है।

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