ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर इन दिनों काफी चर्चा है ये प्रोजेक्ट जहां भारत सरकार का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है तो वहीं इसका विरोध भी हो रहा है दरअसल ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट देश की सबसे बड़ी बुनियादी ढांचा योजनाओं में से एक है, जिसकी लागत 92,000 करोड़ रुपये से अधिक आंकी गई है। इस परियोजना का उद्देश्य ग्रेट निकोबार द्वीप को एक वैश्विक स्तर के व्यापारिक और सैन्य केंद्र में बदलना है।
इस प्रोजेक्ट के तहत अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, आधुनिक हवाई अड्डा, टाउनशिप और पावर प्लांट का निर्माण किया जाएगा। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी रणनीतिक स्थिति है—यह मलक्का जलडमरूमध्य के बेहद करीब स्थित है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्तों में से एक है। यहां से गुजरने वाला मार्ग वैश्विक तेल और व्यापार का बड़ा हिस्सा संभालता है।
👉 यह भी पढ़ें:
- PM Modi Seychelles Visit 2026: 11 साल बाद सेशेल्स दौरे पर प्रधानमंत्री मोदी, हिंद महासागर में भारत की रणनीति होगी और मजबूत
- हिंद महासागर में भारतीय नौसेना का दम! INS Kolkata ने समुद्री लुटेरों का हमला किया नाकाम
- हिंद महासागर से गूंजी भारत की ताकत, लंबी दूरी की परमाणु मिसाइल परीक्षण से दुनिया सतर्क
- हिंद महासागर में अमेरिकी कार्रवाई: चीन से ईरान जा रहे कार्गो जहाज पर छापा, हथियारों से जुड़ी सामग्री बरामद
- हिंद महासागर की गहराइयों में मिली प्राचीन सभ्यता: सिंधु और सुमेर से भी पुरानी हो सकती है
- भारतीय नौसेना को नई ताकत: 15 जनवरी को स्वदेशी युद्धपोत ‘सूरत,’ ‘नीलगिरी’ और पनडुब्बी ‘वाग्शीर’ होंगे शामिल
जानकारों के अनुसार, यह परियोजना हिंद महासागर में भारत की पकड़ को मजबूत करेगी और चीन की बढ़ती समुद्री सक्रियता के सामने एक संतुलन बनाएगी। चीन का अधिकांश व्यापार इसी मार्ग से गुजरता है, जिसे उसकी रणनीति में ‘मलक्का दुविधा’ के रूप में जाना जाता है। ऐसे में भारत की यहां मजबूत उपस्थिति उसके लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है।
यह प्रोजेक्ट केवल सैन्य दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके जरिए ग्रेट निकोबार एक बड़ा लॉजिस्टिक्स और व्यापारिक केंद्र बन सकता है, जिससे वैश्विक शिपिंग ट्रैफिक आकर्षित होगा, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी में सुधार होगा। साथ ही, इससे सिंगापुर और कोलंबो जैसे विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता भी कम होगी।
इस परियोजना को राष्ट्रीय हरित अधिकरण से मंजूरी मिल चुकी है, हालांकि इसके लिए सख्त पर्यावरणीय शर्तें भी तय की गई हैं ताकि द्वीप की जैव विविधता और प्राकृतिक संतुलन को सुरक्षित रखा जा सके।
भौगोलिक दृष्टि से अंडमान और निकोबार द्वीप समूह लगभग 700 किलोमीटर तक फैला हुआ है और इसे मलक्का जलडमरूमध्य के प्रवेश द्वार पर एक “प्राकृतिक विमानवाहक पोत” जैसा माना जाता है। इस श्रृंखला का सबसे दक्षिणी हिस्सा ग्रेट निकोबार है, जो सिंगापुर, पोर्ट क्लांग और कोलंबो से लगभग समान दूरी पर स्थित होकर भारत को एक अनूठा सामरिक लाभ प्रदान करता है।
कुल मिलाकर, ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट न केवल भारत की समुद्री सुरक्षा को नई मजबूती देगा, बल्कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उसकी भूमिका को भी निर्णायक रूप से स्थापित करेगा।



