जब लोगों को बांटना ही था, फिर क्यों दिया था….बंटेंगे तो कटेंगे का नारा

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लंबे समय से जातीय जनगणना की मांग को ठुकराने वाली भाजपा की केंद्र सरकार ने अब इस पर मुहर लगा दी है। अगली जनगणना जाति के हिसाब से होगी। यहां बड़ा सवाल यह है कि अचानक भाजपा का हृदय परिवर्तन कैसे हो गया? राजनीतिक दलों के साथ ही जनता भी ताज्जुब कर रही है।

जरा याद कीजिए, महाराष्ट्र, हरियाणा से लेकर कई प्रदेशों के चुनाव में जब विपक्ष ने जातीय जनगणना, आरक्षण आदि का मुद्दा उठाया तो भाजपा ने एक नया नारा दिया-बंटेंगे तो कटेंगे। जब योगी का यह नारा महाराष्ट्र में गूंजा तो भाजपा में ही इसका विरोध शुरू हो गया, लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को लगा कि यह तो तुरूप का पत्ता है। फिर क्या था भाजपा के ही कई नेताओं के विरोध के बाद भी पीएम नरेंद्र मोदी ने इसे आगे बढ़ाते हुए कहा-एक रहेंगे तो नेक रहेंगे। अब एकता का मंत्र देने वाली यही भाजपा फिर लोगों को बांटने में क्यों जुट गई?

राजनीतिक हलकों में इसके कई जवाब हवा में तैर रहे हैं। पहला पहलगाम हमले से लोगों का ध्यान भटकाना। इसमें सरकार भी स्वीकार कर चुकी है कि कहीं न कहीं चूक हुई है। यह भी तय माना जा रहा है कि सिर्फ भाषणबाजी के अलावा इस मामले में सरकार कुछ ठोस करने की स्थिति में नहीं है? इसके अलावा एक दूसरा कारण विपक्ष से एक बड़े मुद्दे को छीनने का प्रयास भी माना जा रहा है।

पक्ष और विपक्ष इसे अपनी–अपनी जीत बता रहे हैं। कांग्रेस, सपा और राजद जैसे विपक्षी दलों का कहना है कि उनके दवाब में आकर सरकार को यह फैसला लेना पड़ा। कांग्रेस तो इसको लेकर पूरे देश में जागरूकता अभियान चलाने जा रही है। अन्य प्रदेशों के क्षेत्रीय दल भी इसी तरह की कोशिश में लगे हैं।

लोग यह भी कह रहे हैं कि भाजपा इस फैसले के माध्यम से अपने ऊपर लगा अपर कास्ट की पार्टी होने का ठप्पा हटाना चाहती है, लेकिन उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि जाति आधारित राजनीति करने वाली पार्टियां सभी प्रदेशों में हैं। उनका आधार भी इतना मजबूत है कि उसे तोड़ पाना नामुमकिन सा लगता है।

इसी साल बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं। भाजपा को ऐसा लग रहा था कि वहां हिन्दुत्व के भरोसे काम नहीं चल सकता इसलिए जाति का यह नया कार्ड खेल दिया, लेकिन राजनीतिक जानकार कह रहे हैं कि इससे कोई ज्यादा फायदा नहीं होने वाला। बिहार में जितने भी दल हैं, सबकी नींव में जातियां ही हैं। यही उनके परंपरागत वोट बैंक भी हैं। इसमें भाजपा सेंध लगा पाएगी, इसमें संदेह है।

लेकिन, भाजपा शायद ऐसा फैसला लेते समय यह भूल गई कि जातियां सिर्फ बूंदे हैं, जबकि हिन्दुत्व में तो पूरा सागर समाया हुआ था।

अब देखना यह है कि भाजपा का यह दांव कितना कारगर होता है। कहीं ऐसा न हो कि आधी ‘आधी छोड़ पूरी को धावे, आधी मिले न पूरी पावे’ मुहावरा चरितार्थ हो जाए।

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