इन दिनों सरकार के दुलारे मुख्य चुनाव आयुक्त पूरे देश में खलनायक बने हुए हैं। दुलार इतना कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर जब सीजेपी ने उनके खिलाफ आंदोलन का ऐलान किया तो सरकार ने बिना घोषित किए ही आपातकाल लगा दिया। ऐसा आपातकाल, जिसमें सबको सरकार ने एक नजर से देखा।
शनिवार को दिल्ली से आए वीडियो, फोटोज और खबरों को जरा गौर से देखिए। सरकार ने ट्रेनें रोक दीं यानी आम जनता के साथ भी भेदभाव नहीं किया। सरकार ने वकीलों को डिटेन कर लिया यानी कानून का पूरा ध्यान रखा। सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर की बात तो छोड़ दीजिए, सरकार ने बड़े-बड़े मीडिया हाउस के पत्रकारों को भी डिटेन किया।
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ताज्जुब की बात तो यह रही कि सरकार दिल्ली की ओर आने वाली जो ट्रेनें रद्द करना भूल गई, उनके अंदर पुलिस को भेजकर ऐसे लोगों को उतरवा दिया, जिन पर प्रदर्शनकारी होने का शक था। सरकार ने इनमें से कई को डिटेन भी किया।
सरकार का समाजवादी नजरिया इतना तगड़ा था कि ट्रेनों के साथ ही फ्लाइट का भी पूरा ध्यान रखा। सीजेपी के जो प्रमुख नेता दिल्ली आ रहे थे, उनके लिए फ्लाइट में ही विशेष इंतजाम किए गए। दिल्ली पहुचते ही फ्लाइट में पुलिस भेज दी गई और उन्हें वहीं से हिरासत में ले लिया गया। खास बात यह कि कहीं लोग कोई विवाद न कर बैठें, इसलिए विशेष तौर पर महिला पुलिस को विमान में भेजा गया।
सरकार का समाजवादी नजरिया इतना तगड़ा था कि होटलों, रेस्ट हाउसों और यहां तक कि गुरुद्वारे का भी विशेष ध्यान रखा गया। वहां घुसे लोगों को भी खदेड़ कर डिटेन किया गया। सड़कों और फुटपाथों पर दिख रहे लोगों को भी दौड़ा-दौड़ा कर पुलिस ने पकड़ा।
अब आप भले ही इसे अघोषित इमरजेंसी कह दीजिए, कर्फ्यू कह दीजिए, लॉकडाउन कह दीजिए, लेकिन सरकार के नजरिए से यह तो समाजवाद है। आप यह नहीं कह सकते कि सरकार ने किसी के साथ भेदभाव किया है।



