महाअष्टमी पर उज्जैन में नगर पूजा की परंपरा एक बार फिर जीवंत हो गई। इस वर्ष भी उज्जैन में महाअष्टमी के अवसर पर नगर पूजा का आयोजन भव्य रूप से किया गया। नगर पूजा के दौरान कलेक्टर ने माता को मदिरा का भोग लगाया, जो इस परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उज्जैन में महाअष्टमी पर नगर पूजा का आयोजन
19 अक्टूबर 2026 को उज्जैन में शारदीय नवरात्रि की महाअष्टमी पर ऐतिहासिक नगर पूजा संपन्न हुई। इस पूजा का शुभारंभ सुबह 8 बजे चौबीस खंभा माता मंदिर से हुआ। पूजा में प्रशासनिक अधिकारियों के साथ स्थानीय जनता ने भी भाग लिया। महाअष्टमी पर नगर पूजा का उद्देश्य नगर की सुरक्षा और समृद्धि सुनिश्चित करना है।
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कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक ने माता को लगाया मदिरा का भोग
परंपरा के अनुसार, उज्जैन कलेक्टर रोशन कुमार सिंह और पुलिस अधीक्षक प्रदीप शर्मा ने माता महामाया और माता महालया को मदिरा का भोग अर्पित किया। यह भोग नगर पूजा की विशिष्ट परंपरा का हिस्सा है, जो लगभग 2100 वर्ष पुरानी है। इस भोग के माध्यम से नगर को प्राकृतिक आपदाओं और बीमारियों से बचाने की कामना की जाती है।
नगर पूजा यात्रा का विस्तृत मार्ग और पूजा का स्वरूप
पूजा के बाद प्रशासनिक अधिकारियों और कोटवारों का दल लगभग 27 किलोमीटर लंबी पूजा यात्रा पर निकला। यह यात्रा चौबीस खंभा मंदिर से शुरू होकर शहर के 40 से अधिक देवी, भैरव और हनुमान मंदिरों तक फैली हुई थी। यात्रा के दौरान मदिरा की धार और पूजा-अर्चना निरंतर जारी रही।

पूजा में मदिरा के अलावा अन्य भोग सामग्री भी शामिल
मदिरा अर्पण के अतिरिक्त, माता को सोलह श्रृंगार सामग्री, चुनरी, पूड़ी, भजिया और चने का भी भोग दिया गया। ये सामग्रियां बलि और बलबाकल के प्रतीक स्वरूप मानी जाती हैं। इस प्रकार की पूजा से स्थानीय श्रद्धालुओं का धार्मिक अनुभव और भी गहरा होता है।
नगर पूजा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सांस्कृतिक महत्व
यह नगर पूजा परंपरा राजा विक्रमादित्य के शासनकाल से चली आ रही है और स्वतंत्रता के बाद भी इसे सरकारी स्तर पर निरंतर निभाया जाता है। इस पूजा का सांस्कृतिक महत्व अत्यंत गहरा है और यह उज्जैन की धार्मिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है। इससे नगरवासियों में एकता और सामाजिक सद्भाव भी बढ़ता है।
नगर पूजा पर विवाद और भविष्य की संभावनाएं
हालांकि इस परंपरा को लेकर कुछ विवाद भी सामने आए हैं। महाकाल सेना ने चैत्र नवरात्र में नगर पूजा के आयोजन को परंपरा से छेड़छाड़ बताया है। इसके बावजूद यह पूजा शारदीय नवरात्रि की महाअष्टमी पर ही परंपरागत रूप से आयोजित होती रही है। भविष्य में इस परंपरा को लेकर व्यापक चर्चा और समझौता अपेक्षित है।



