मध्यप्रदेश में भी गुजरात फॉर्मूला लागू करने की तैयारी, कई बड़बोले और नॉन परफॉर्मर मंत्रियों की होगी छुट्टी!

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भोपाल। भाजपा मध्यप्रदेश में भी गुजरात फॉर्मूला लागू करने की तैयारी में हैं। ऐसे में कई बड़बोले और नॉन परफॉर्मर मंत्रियों की छुट्‌टी हो सकती है। कई मंत्री ऐसे हैं, जिनका अपने काम और क्षेत्र पर ध्यान नहीं है, वहीं कई सत्ता में रहते हुए भी सत्ता विरोध में जुटे हुए हैं। ऐसे में भाजपा उनकी छुट्‌टी कर नए विधायकों को मंत्री पद पर विराजमान करा सकती है।

उल्लेखनीय है कि गुजरात में लंबे समय से काबिज भाजपा ने मंत्रिमंडल विस्तार में जो फॉर्मूला अपनाया है, उससे कई प्रदेशों के सत्ताधीशों की नींद उड़ गई है। गुजरात में जो कुछ भी हुआ, उसके पीछे कई कारण रहे हैं, लेकिन इसमें से एक बड़ा कारण लंबे समय से सत्ता में होने के कारण लोगों की नाराजगी भी बताई जा रही है। मध्यप्रदेश भी गुजरात जैसा ही राज्य है।

विधानसभा चुनाव में भी हुए थे प्रयोग

मध्यप्रदेश में भाजपा लंबे समय से काबिज है। यहां भी पिछले विधानसभा में कई प्रयोग हुए। केंद्र से कई मंत्रियों को विधानसभा चुनाव लड़ने भेजा गया। इनमें से अधिकांश सीएम पद के लिए घुंघरू बांधकर बैठे थे, लेकिन अचानक मोहन यादव के नाम की घोषणा हो गई। मोहन यादव के सीएम बनने के बाद से यहां के कई सीएम इन वेटिंग सत्ता विरोधी गतिविधियों में सम्मिलित हो गए। पीठ पीछे से लेकर कैबिनेट मीटिंग तक विरोध किया जाने लगा। हालांकि मोहन यादव ने भाजपा आलाकमान के फ्री हैंड देने के कारण असंतोषियों पर काबू रखा है, लेकिन अगर ज्यादा समय तक यह चलता रहा तो मध्यप्रदेश में भी गुजरात मॉडल लागू हो सकता है। ऐसे में खुद को दिग्गज समझने वाले कई मंत्रियों की छुट्‌टी हो सकती है।

मध्यप्रदेश में भी कई मंत्रियों से जनता है नाराज

मध्यप्रदेश में कई मंत्री ऐसे हैं, जो न अपने विभाग पर ध्यान दे रहे हैं और न ही अपने विधानसभा क्षेत्र और न ही अपने प्रभार वाले जिले पर। कई बार संगठन से लेकर सीएम तक समझाइश दे चुके हैं, लेकिन कुछ मंत्री अपने आप में सुधार लाने के तैयार नहीं हैं। सूत्र बताते हैं कि भाजपा आलाकमान की ऐसे मंत्रियों पर कड़ी नजर है। अब जब भी मंत्रिमंडल में फेरबदल होगा, इनका विशेष ध्यान रखा जाएगा।

गुजरात में एक साथ ले लिया था सबका इस्तीफा

गुजरात में दिसंबर 2022 में सरकार के गठन के महज तीन साल के भीतर पूरी कैबिनेट बदल दी गई। सारे मंत्रियों के इस्तीफे एक साल ले लिए गए थे और उनमें से कई को दोबारा मौका नहीं मिला। इसके कई कारण हैं, लेकिन एक कारण मंत्रियों की ग्राउंड रिपोर्ट ठीक नहीं है। दूसरी वजह स्थानीय निकाय के चुनाव हैं जो बहुत जल्द होने वाले हैं। भाजपा का यह कैबिनेट फेरबदल मिशन 2027 के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है। पार्टी आगामी विधानसभा चुनावों से पहले सारे नए समीकरण आजमा कर देखना चाहती है। गुजरात में सरकार के प्रति लोगों की नाराजगी बढ़ रही थी। इसीलिए कई वर्षों से भाजपा यह प्रयोग कर रही है। सत्ता में बने रहने के लिए मंत्री, मुख्यमंत्री और पार्षदों को बदलकर सत्ता विरोधी लहर को मात देने की कोशिश होती है।

नड्‌डा ने गुजरात को बताया था लैबोरेटरी

वर्ष 2022 जब रुपाणी को अचानक इस्तीफा देने के लिए कहा गया था। उस समय भजापा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने कहा खा कि गुजरात पार्टी के लिए शासन और संगठन का लैबोरेटरी है और भाजपा इस मॉडल को पूरे देश में लागू करेगी। गुजरात भाजपा ने राजनीतिक नियंत्रण बनाए रखने के लिए कई संगठनात्मक और शासन संबंधी बदलाव किए। पहली बार उसने नो–रिपीट फॉर्मूला 2021 के नगरपालिका चुनाव में इस्तेमाल किया था। इसमें तीन कार्यकाल पूरा कर चुके और 60 साल से ऊपर के लोगों को चुनाव लड़ने से रोका गया। भाजपा ने दिल्ली में भी इसी रणनीति का इस्तेमाल किया, जब उसने 2017 के नगर निगम चुनाव से पहले सभी पार्षदों को बदल दिया।

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