बीजेपी ने हाल ही में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) पर अमेरिका-पाकिस्तान से फंडिंग लेने का गंभीर आरोप लगाया है। इस आरोप-प्रत्यारोप के बीच, कोर्ट ने इस मामले में रिपोर्ट मांगी है। यह विवाद राजनीतिक गलियारों में गर्माहट पैदा कर रहा है।
बीजेपी ने CJP पर विदेशी फंडिंग का आरोप लगाया
केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने CJP और उसके नेताओं पर अमेरिका और पाकिस्तान से फंडिंग लेने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके को अमेरिका स्थित दानदाताओं से और रणनीतिकार आशुतोष रांका को पाकिस्तानी नेताओं से वित्तीय सहायता मिल रही है। मंत्री ने बताया कि उनके पास इस विदेशी फंडिंग के ठोस सबूत और खुफिया इनपुट मौजूद हैं।
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कोर्ट ने मामले की रिपोर्ट मांगी, जांच जारी
इस आरोप के बाद दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने CJP के प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका को समन भेजा है। जांच में उन्हें आदेशों का उल्लंघन करने और बिना अनुमति विरोध प्रदर्शन स्थल में घुसने के मामलों में पूछताछ के लिए बुलाया गया है। वहीं, दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले जुलाई 2026 में CJP से जुड़े विदेशी फंडिंग के आरोपों की NIA जांच की मांग वाली जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार किया था।
CJP नेताओं ने आरोपों का किया कड़ा खंडन
CJP के नेता सौरव दास, आशुतोष रांका और अभिजीत दिपके ने बीजेपी के आरोपों को पूरी तरह से बेबुनियाद बताया है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सरकार के पास ठोस सबूत थे, तो पहले उनसे बातचीत क्यों की जाती रही। उनका दावा है कि यह राजनीतिक दबाव बनाने का प्रयास है और वे देश के हित में काम कर रहे हैं।

विपक्ष ने भी भाजपा के आरोपों पर जताई आपत्ति
कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खड़गे ने भाजपा के आरोपों पर सवाल उठाते हुए चुनौती दी कि अगर सरकार के पास विदेशी फंडिंग के सबूत हैं, तो उन्हें सार्वजनिक रूप से पेश किया जाए। उन्होंने इसे राजनीतिक चालबाज़ी करार दिया और कहा कि विपक्षी दलों को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है।
राजनीतिक माहौल में बढ़ा तनाव
बीजेपी और CJP के बीच विदेशी फंडिंग को लेकर आरोप-प्रत्यारोप ने राजनीतिक वातावरण को तनावपूर्ण बना दिया है। इस विवाद ने आगामी चुनाव और देश की राजनीतिक स्थिरता पर भी असर डाला है। जनता में भी इस मामले को लेकर चिंता और जिज्ञासा बनी हुई है।
आगे की संभावित कार्रवाई और आम जनता पर प्रभाव
कोर्ट की रिपोर्ट के आधार पर आगे की जांच और कार्रवाई हो सकती है। इससे राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता पर असर पड़ेगा। आम जनता के लिए यह मामला साफ-सुथरे राजनीतिक माहौल की मांग को और बढ़ावा देता है। कानून व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता बनाए रखना इस मामले में अहम होगा।



