इंदौर के महालक्ष्मी मंदिर में दिवाली से पहले 5 दिवसीय उत्सव का शुभारंभ हो गया है। यह धार्मिक महोत्सव परंपरा अनुसार धनतेरस से शुरू होकर भाई दूज तक चलता है और इस दौरान मंदिर में विशेष पूजा एवं श्रृंगार का आयोजन किया जाता है।
5 दिवसीय उत्सव की परंपरा और आयोजन
महालक्ष्मी मंदिर में यह 5 दिवसीय उत्सव दीपावली के अवसर पर विशेष रूप से मनाया जाता है। इस वर्ष भी कार्यक्रम की शुरुआत धनतेरस से हुई है। मंदिर प्रशासन की ओर से बताया गया है कि यह उत्सव भाई दूज तक चलेगा, जिसमें हर दिन मां महालक्ष्मी की पूजा-आराधना के साथ विभिन्न धार्मिक कृत्य किए जाएंगे।
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उत्सव के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ देखने को मिल रही है।

मंदिर का ऐतिहासिक महत्व और स्थान
इंदौर के राजवाड़ा क्षेत्र में स्थित महालक्ष्मी मंदिर का इतिहास सन 1832 तक जाता है। इसे मल्हारराव होलकर द्वितीय ने स्थापित किया था। यह मंदिर भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के पास स्थित है और शहर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक माना जाता है।
इतिहास के साथ-साथ इसका धार्मिक महत्व भी गहरा है, जिसके चलते दिवाली जैसे प्रमुख त्योहारों पर यहां भक्तों की भारी भीड़ जुटती है।
महालक्ष्मी मां का विशेष श्रृंगार और पूजा विधि
उत्सव के दौरान महालक्ष्मी मंदिर में मां का रोजाना तीन बार विशेष रूप से श्रृंगार किया जाता है। सुबह, दोपहर और शाम को मां के अलग-अलग श्रृंगार भक्तों को देखने को मिलते हैं।
मंदिर प्रबंधन ने बताया कि इस बार 56 भोग मां को अर्पित किए जाएंगे, जो भक्तों की आस्था को और भी प्रगाढ़ बनाते हैं।

श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति
मंदिर से लेकर गुरुद्वारा चौराहा तक श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग रही हैं। लोग मां महालक्ष्मी के दर्शन और पूजा में भाग लेने के लिए सुबह से ही मंदिर पहुंच रहे हैं।
इस भीड़ को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है ताकि किसी प्रकार की असुविधा न हो।
सुरक्षा व्यवस्था और पुलिस प्रशासन की भूमिका
भीड़ नियंत्रण के लिए मंदिर परिसर और आसपास के रास्तों पर पुलिस ने बैरिकेडिंग की व्यवस्था की है। पुलिस प्रशासन लगातार निगरानी कर रहा है ताकि उत्सव सुचारू रूप से संपन्न हो सके।
इसके अलावा, ट्रैफिक नियंत्रण के लिए भी विशेष इंतजाम किए गए हैं ताकि श्रद्धालुओं को आने-जाने में परेशानी न हो।
उत्सव का आम लोगों पर प्रभाव और धार्मिक महत्व
यह 5 दिवसीय उत्सव न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक रूप से भी लोगों को जोड़ता है। दिवाली की खुशियों को बांटने का यह माध्यम बनता है।
शहर के लोगों के लिए यह समय एकजुटता और आध्यात्मिकता का प्रतीक है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी प्रोत्साहन मिलता है।



