SEM कोर्ट ने अभिजीत दीपके को जमानत दी है, जिसमें समाज में शांति बनाए रखने की एक अहम शर्त भी शामिल है। यह फैसला 11 अक्टूबर 2026 को दिल्ली की स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) कोर्ट, दिल्ली कैंट में सुनाया गया। इस फैसले से कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके समेत पार्टी के अन्य नेताओं की रिहाई हुई है।
अभिजीत दीपके की गिरफ्तारी और कोर्ट में पेशी
अभिजीत दीपके को दिल्ली पुलिस ने 16 अक्टूबर को आईजीआई एयरपोर्ट से निवारक हिरासत में लिया था। पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 की धारा 126 और 170 के तहत कार्रवाई की। इसके बाद, 11 अक्टूबर को उन्हें SEM कोर्ट में पेश किया गया। कोर्ट ने ₹50,000 के श्योरिटी बॉन्ड पर जमानत मंजूर की।
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कोर्ट के समक्ष पेशी के दौरान भारी पुलिस बल तैनात था। पुलिस ने बताया कि हिरासत का मकसद कानून व्यवस्था बनाए रखना था, क्योंकि सीजेपी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने वाला था।

जमानत पर लगी महत्वपूर्ण शर्त
SEM कोर्ट ने जमानत देते समय मुख्य शर्त के रूप में यह तय किया कि अभिजीत दीपके और अन्य नेताओं को एक वर्ष तक समाज में शांति और अच्छा व्यवहार बनाए रखना अनिवार्य होगा। यह शर्त पुलिस द्वारा लगाए गए निरोधात्मक उपायों के तहत लागू की गई है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि इस अवधि में कोई भी सार्वजनिक अशांति या कानून व्यवस्था भंग करने वाला कृत्य होता है, तो जमानत रद्द की जा सकती है। यह शर्त स्थानीय प्रशासन और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
प्रदर्शन और गिरफ्तारी का राजनीतिक संदर्भ
अभिजीत दीपके की गिरफ्तारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित प्रदर्शन से जुड़ी थी। सीजेपी ने चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण की मांग की थी।
इस प्रदर्शन को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने निरोधात्मक कार्रवाई की। इससे पहले पार्टी के अन्य नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को भी हिरासत में लिया गया था। सीजेपी इस कार्रवाई को राजनीतिक दबाव और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश के रूप में देखती है।

दिल्ली पुलिस की भूमिका और कानूनी धाराएं
दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई करते हुए BNSS की धारा 126 और 170 का सहारा लिया। ये धाराएं विशेष रूप से शांति व्यवस्था बनाए रखने और किसी भी संभावित हिंसा को रोकने के लिए बनाई गई हैं।
पुलिस के अनुसार, हिरासत का मकसद व्यापक कानून व्यवस्था बनाए रखना था, खासकर ऐसे वक्त में जब जंतर-मंतर पर बड़ा प्रदर्शन प्रस्तावित था। हालांकि, सीजेपी ने पुलिस की कार्रवाई को गैरकानूनी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन बताया।
आम जनता और राजनीतिक माहौल पर असर
इस मामले से आम जनता में राजनीति और पुलिस कार्रवाई के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती स्पष्ट हुई है। शांति बनाए रखने के नाम पर प्रदर्शनकारियों की हिरासत और जमानत पर कड़ी शर्तें लोकतांत्रिक अधिकारों और कानून व्यवस्था के बीच तनाव पैदा करती हैं।
आगे चलकर यह देखना होगा कि सीजेपी के नेता अपनी शर्तों का पालन कैसे करते हैं और राजनीतिक विरोध-प्रदर्शन की स्थिति पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।
सीजेपी के भविष्य के कदम और कानूनी प्रक्रिया
अब अभिजीत दीपके और अन्य नेताओं की रिहाई के बाद सीजेपी की रणनीति पर सबकी नजर होगी। पार्टी ने पहले ही चुनाव आयोग के खिलाफ आवाज उठाई है और प्रदर्शन जारी रखने की योजना है।
कोर्ट द्वारा लगाए गए शांति बनाए रखने के नियमों को ध्यान में रखते हुए, आगे की गतिविधियों में संयम बरतना पार्टी के लिए जरूरी होगा। कानूनी प्रक्रिया के तहत यदि कोई उल्लंघन होता है तो जमानत रद्द हो सकती है, जिससे राजनीतिक माहौल में और भी तनाव बढ़ सकता है।



