कांग्रेस के लिए रामलीला मैदान रैली प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गई है, क्योंकि 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रस्तावित ‘INDIA’ गठबंधन की महारैली को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इस रैली का मुख्य उद्देश्य मतदाता सूची में गड़बड़ी और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के खिलाफ आवाज उठाना तथा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करना है।
रामलीला मैदान रैली की तैयारी और अनुमति
दिल्ली पुलिस ने 17 अक्टूबर को इस रैली के आयोजन के लिए औपचारिक अनुमति जारी की है। पुलिस ने इसे सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक आयोजित करने की मंजूरी दी है। पूरे रामलीला मैदान को 14 अलग-अलग सुरक्षा ज़ोन में बांटा गया है। सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करने के लिए लगभग 4,000 सुरक्षाकर्मी तैनात किए जाएंगे, जिनमें स्थानीय पुलिस और सीएपीएफ शामिल हैं। इसके अलावा, 200 से 250 सीसीटीवी कैमरे भी लगाए जाएंगे ताकि किसी भी अप्रिय घटना पर तुरंत नज़र रखी जा सके।
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रैली का मार्च रूट और प्रमुख नेता
रैली के दिन, यानी 1 नवंबर को दोपहर 12 बजे मिंटो रोड – कनॉट प्लेस जंक्शन से ‘चलो दिल्ली’ मार्च शुरू होगा। इस मार्च के माध्यम से विपक्षी गठबंधन रामलीला मैदान पहुंचेगा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा सहित सपा, तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों के शीर्ष नेता इस रैली में शिरकत करेंगे। यह रैली विपक्ष की एकजुटता और चुनावी मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने की कोशिश मानी जा रही है।
विपक्ष की मांगें और केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया
रैली का मुख्य मुद्दा मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) में गड़बड़ी का विरोध है। इसके अलावा, चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की जाएगी। हालांकि, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इससे पहले कांग्रेस को कड़ी चुनौती देते हुए पांच महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं, जिनमें 2014 और 2024 के चुनाव परिणामों, मतदाता सूची की वैधता और कांग्रेस के राजनीतिक रवैये पर सवाल शामिल हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ दल संविधान और लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।
त्योहारी मौसम में रैली को लेकर विरोध
1 नवंबर की तारीख को लेकर राजनीतिक और सामाजिक विवाद भी बढ़ता जा रहा है। दीपावली जैसे बड़े त्योहार के बीच इस रैली को आयोजित करने पर व्यापारिक संगठन चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री ने विरोध जताया है। उनका कहना है कि यह आयोजन व्यापार को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। वहीं, 1984 के सिख विरोधी दंगों की बरसी के दिन रैली आयोजित करने को लेकर सिख समुदाय में भी आक्रोश है। विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने राजनीतिक मर्यादा और दोहरे मापदंडों पर सवाल उठाए हैं। भाजपा ने भी 1 नवंबर को दिल्ली में अपनी खुद की रैली निकालने का ऐलान किया है।
व्यापारियों ने किया है रैली का विरोध
यह रैली न केवल विपक्ष के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक इम्तिहान है, बल्कि आम जनता और दिल्ली के व्यापारिक समुदाय के लिए भी संवेदनशील विषय बन गई है। त्योहारों के बीच बड़े पैमाने पर राजनीतिक प्रदर्शन से सामाजिक सौहार्द और आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित हो सकती हैं। इसके कारण व्यापारियों ने इसका विरोध भी किया है। अलावा, 1984 के दंगों की बरसी पर राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन को लेकर भावनात्मक विवाद भी गहरा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह रैली आगामी विधानसभा चुनावों को भी प्रभावित कर सकती है।
कल विपक्षी एकजुटता की परीक्षा भी
1 नवंबर को होने वाली रामलीला मैदान रैली कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई साबित हो सकती है। यदि रैली शांतिपूर्ण और संगठित रूप से संपन्न होती है, तो यह विपक्ष की एकजुटता को मजबूत कर सकती है। वहीं, यदि कोई हिंसक घटना होती है, तो राजनीतिक नुकसान भाजपा सहित अन्य दलों को भी हो सकता है। इस रैली के बाद देश की राजनीति में नई बहस और रणनीतियाँ सामने आएंगी।



