बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने समाजवादी पार्टी और उसके PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) नारे पर 2 अक्टूबर 2026 की सुबह अपने आधिकारिक ‘एक्स’ (X) प्लेटफॉर्म पर तीखा हमला बोला। मायावती ने समाजवादी पार्टी के इस नारे को राजनीतिक ढोंग और जनता के साथ छलावा बताया। उनका यह बयान राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है।
मायावती ने PDA को राजनीतिक छलावा बताया
बसपा प्रमुख मायावती ने स्पष्ट किया कि समाजवादी पार्टी के PDA नारे का केवल वोट हासिल करने के लिए इस्तेमाल होता है। उन्होंने कहा कि सपा को चुनाव जीतने के लिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों का वोट चाहिए होता है, लेकिन टिकट वितरण में ये वर्ग नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। मायावती ने इसे जनता के साथ धोखा और छलावा करार दिया।

सपा पर टिकट चयन में परिवारवाद और धनबल का आरोप
मायावती ने समाजवादी पार्टी पर आरोप लगाया कि वे सांसद और विधायक बनाने के लिए टिकट परिवार के सदस्यों और बड़े उद्योगपतियों को देते हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की राजनीति में पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी नहीं होती। उनका तंज खासकर सपा के टिकट वितरण के तरीके पर था।
राज्यसभा उम्मीदवारों के नामों पर सवाल उठाए
बसपा सुप्रीमो ने समाजवादी पार्टी द्वारा घोषित राज्यसभा उम्मीदवारों के चुनाव को भी निशाना बनाया। उन्होंने प्रोफेसर रामगोपाल यादव को सपा प्रमुख अखिलेश यादव का करीबी रिश्तेदार बताते हुए परिवारवाद का उदाहरण बताया। इसके अलावा धनराज परिमल नाथवानी को टिकट दिए जाने को भी उद्योगपतियों के दबाव में लिए गए फैसले के रूप में देखा।
तीसरे राज्यसभा उम्मीदवार को फेस सेविंग बताया
मायावती ने तीसरे उम्मीदवार के बारे में कहा कि यह नाम केवल सपा की छवि बचाने और चुनाव हारने के लिए खड़ा किया गया है। उन्होंने भविष्यवाणी की कि इस उम्मीदवार को लेकर जनता में भी संदेह की भावना है। यह समाजवादी पार्टी के रणनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है।

बसपा की राजनीति परिवार और पूंजीपतियों से मुक्त
मायावती ने कहा कि उनकी पार्टी किसी भी चुनाव में परिवारवाद या धनबल का सहारा नहीं लेती। बसपा गरीब, मध्यम वर्ग और कर्मठ अंबेडकरवादी लोगों को ही अपना उम्मीदवार बनाती है। उन्होंने अपनी पार्टी की साफ-सुथरी और पारदर्शी राजनीति पर जोर दिया।
मायावती के हमले का आम जनता और राजनीति पर असर
मायावती के इस हमले से समाजवादी पार्टी की छवि पर सवाल उठे हैं। आम आदमी के बीच यह बहस तेज होगी कि क्या सपा वाकई पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करती है या केवल वोट बैंक की राजनीति करती है। आगे आने वाले चुनावों में इस तरह के आरोप सियासी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं।
राजनीतिक विश्लेषण: आगे क्या हो सकता है?
मायावती का यह हमला आगामी चुनावों से पहले समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती साबित हो सकता है। अगर बसपा अपने इस आरोप को प्रभावी ढंग से जनता तक पहुंचाती है तो सपा को अपने गठबंधन और टिकट वितरण नीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। राजनीतिक समीकरण और दलों के बीच प्रतिस्पर्धा और भी तेज हो सकती है।



