मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद मामला अब सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ राज्यसभा चुनाव को रोमांचक बना दिया है, बल्कि मध्य प्रदेश की राजनीति में भी नई हलचल पैदा कर दी है।
जहां कुछ दिन पहले तक राज्यसभा की तीन सीटों का परिणाम लगभग तय माना जा रहा था, वहीं अब मीनाक्षी नटराजन का नामांकन खारिज होने के बाद पूरे चुनावी समीकरण पर सवाल खड़े हो गए हैं।
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क्या है पूरा मामला?
मध्य प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए चुनाव होना है। विधानसभा में संख्या बल के आधार पर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दो सीटें और कांग्रेस एक सीट आसानी से जीत सकती है।
लेकिन अचानक चुनावी तस्वीर तब बदल गई जब रिटर्निंग ऑफिसर ने कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र निरस्त कर दिया। इस फैसले के बाद कांग्रेस ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला कदम बताया है।
बीजेपी की शिकायत के बाद हुई कार्रवाई
भाजपा की ओर से दर्ज कराई गई शिकायत में आरोप लगाया गया था कि मीनाक्षी नटराजन ने नामांकन के साथ जमा किए गए फॉर्म-26 में एक कथित लंबित न्यायिक मामले की जानकारी नहीं दी।
रिटर्निंग ऑफिसर ने इसी आधार पर उनका नामांकन रद्द कर दिया। हालांकि कांग्रेस ने इस आरोप को पूरी तरह निराधार और तथ्यों के विपरीत बताया है।
कांग्रेस का पलटवार, चुनाव आयोग पहुंचा प्रतिनिधिमंडल
नामांकन रद्द होने के बाद कांग्रेस ने तुरंत मोर्चा संभालते हुए वरिष्ठ नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग भेजा। पार्टी नेताओं ने आयोग के समक्ष कानूनी और संवैधानिक पहलुओं को रखते हुए रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की।
कांग्रेस को उम्मीद है कि चुनाव आयोग इस मामले में हस्तक्षेप कर सकता है और रिटर्निंग ऑफिसर के आदेश पर रोक लगाने का फैसला ले सकता है।

अभिषेक मनु सिंघवी ने फैसले पर उठाए सवाल
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने इस पूरे मामले को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है।
उन्होंने कहा कि रिटर्निंग ऑफिसर ने कानून की गलत व्याख्या की है। सिंघवी के अनुसार मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ किसी अदालत ने अब तक कोई संज्ञान (Cognizance) नहीं लिया है। केवल एक नोटिस जारी किया गया था, जिसमें उनसे जवाब मांगा गया था।
उन्होंने कहा कि कानून के अनुसार केवल नोटिस जारी होने से कोई आपराधिक मामला स्थापित नहीं हो जाता।
“2 और 2 को 7 बना दिया गया”
सिंघवी ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि रिटर्निंग ऑफिसर ने “2 और 2 को सिर्फ 5 नहीं, बल्कि 7 बना दिया है।”
उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 33A के तहत उम्मीदवार को केवल उन्हीं मामलों की जानकारी देनी होती है, जिनमें अदालत संज्ञान लेकर आगे की प्रक्रिया शुरू कर चुकी हो। यदि संज्ञान ही नहीं लिया गया, तो ऐसी जानकारी छिपाने का सवाल ही नहीं उठता।
कांग्रेस का दावा है कि नामांकन रद्द करने का आधार ही कानूनी रूप से कमजोर है।
सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा मामला
चुनावी लड़ाई अब कानूनी मोर्चे पर पहुंच चुकी है। मीनाक्षी नटराजन ने रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
अब सभी की नजरें सर्वोच्च न्यायालय पर टिकी हैं, क्योंकि उसका फैसला न केवल राज्यसभा चुनाव के नतीजों को प्रभावित कर सकता है बल्कि चुनावी प्रक्रिया की व्याख्या पर भी महत्वपूर्ण असर डाल सकता है।
क्या बदल जाएगा राज्यसभा चुनाव का समीकरण?
मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव अब केवल एक चुनाव नहीं बल्कि बड़ा राजनीतिक और कानूनी संघर्ष बनता दिखाई दे रहा है। यदि सुप्रीम कोर्ट या चुनाव आयोग से कांग्रेस को राहत मिलती है, तो चुनावी तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।
सबसे बड़ा सवाल
क्या मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलेगी? क्या चुनाव आयोग रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले पर पुनर्विचार करेगा? और क्या इस विवाद से मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव का पूरा गणित बदल जाएगा?
आपकी क्या राय है? क्या नामांकन रद्द करना सही फैसला था या कांग्रेस के साथ अन्याय हुआ है? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।



