अफसर नहीं सुन रहे थे तो आप क्या कर रहे थे ‘नेताजी’, जनता ने तो आपको वोट दिया था, अफसरों की तरह आप पर भी क्यों न हो कार्रवाई?

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इंदौर। इंदौर के भागीरथपुरा में गंदे पानी से हुई मौतों के बाद नगर निगम आयुक्त से लेकर कई अधिकारियों पर कार्रवाई हो चुकी है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इसके लिए सिर्फ अफसर ही जिम्मेदार हैं। जनता तो अफसरों को जानती नहीं। जनता ने तो पार्षद, महापौर और विधायक को चुना था, तो क्या अफसरों की तरह नेताओं पर भी एक्शन नहीं होना चाहिए?

इस मामले में अब नगर निगम की पूरी हकीकत जनता के सामने आ चुकी है। पाइप बदलने वाली फाइल के हर पन्ने भी बाहर आ चुके हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि पाइप लाइन बदलने की प्रक्रिया में अफसरों के साथ जनप्रतिनिधि भी उतने ही जिम्मेदार हैं। ऐसे में सिर्फ अफसरों के मत्थे सारा दोष मढ़ देना उचित नहीं है।

अफसर नहीं सुन रहे थे, सिर्फ बहाना

यह कैसी विडंबना है कि इंदौर के चुने हुए महापौर और मंत्री की नगर निगम के अफसर नहीं सुन रहे थे। कई बार मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से लेकर महापौर पुष्यमित्र भार्गव तक यह बात कह चुके हैं। इसका मतलब साफ है कि आपको कोई महत्व नहीं देता, ऐसे में क्या आप जनप्रतिनिधि बनने लायक हो। जनता ने आपको चुनकर इसीलिए तो भेजा था कि आप उनका काम कराएं, लेकिन आप तो फेल हो गए।

क्या महापौर परिषद भी थी अनजान

इस मामले में यह भी स्पष्ट है कि भागीरथपुरा में पाइप बदलने की फाइल महापौर परिषद में कई बार गई है। अगर अफसर इस फाइल को दबाकर बैठे थे, तो महापौर परिषद के सदस्य, संबंधित पार्षद और महापौर क्या कर रहे थे? ऐसा तो नगर निगम में कभी हुआ नहीं कि अफसर आपकी न सुनें। कुछ मामलों में हो सकता है, लेकिन इतने संवेदनशील मामले में जब अफसर आपकी नहीं सुन रहे थे तो आपने मुंह में दही क्यों जमाए रखा?

पहले तो अफसरों को पीट भी देते थे

इंदौर का कोई भी व्यक्ति यह मानने को तैयार नहीं कि अफसर आपकी नहीं सुनते। सबको पता है कि आपका कोई काम नहीं रुकता। अगर कोई काम रोकता भी है तो आप कितना हो-हल्ला मचाते हो, यह भी सबको पता है। इंदौर ने वह दौर भी देखा है, जब सरकारी ऑर्डर के बाद भी नगर निगम में ज्वाइनिंग के लिए अफसरों को नंदा नगर के कितने चक्कर लगाने पड़ते थे। लोग यह भी नहीं भूले हैं कि आप लोगों ने ही नगर निगम परिसर में इंजीनियरों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा भी है।

अब खुद ही जनता के सामने कर दो समर्पण

अगर आपको राजनीति करनी है तो आप खुद ही जनता के सामने समर्पण कर दो। यह बहाने मत बनाओ कि अफसर नहीं सुनते थे। सीएम के नाम पर चमकाते थे। अफसर अगर काम नहीं करते थे तो आपकी जिम्मेदारी थी उनसे काम कराना। इसलिए बेहतर यह होगा कि जनता के सामने खुद आकर बोलो कि हां, हमसे गलती हुई है। हमने भी लापरवाही की है।

पार्षद और जलकार्य प्रभारी की भूमिका पर सवाल

इस पूरे मामले में जलकार्य प्रभारी बबलू शर्मा और पार्षद कमल वाघेला की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। जब नगर निगम में काम नहीं हो रहा था तो उन्होंने अपने आकाओं को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी? अगर फिर भी बात नहीं बन रही थी तो जनता के साथ सड़कों पर क्यों नहीं उतरे? बात-बात पर थाना घेरने वाले बबलू शर्मा आखिर क्या कर रहे थे?

क्लोरीन की मात्रा बढ़वाने की बात आई सामने

सूत्र बताते हैं कि 20-21 दिसंबर को जब काफी ज्यादा गंदा पानी आ रहा था तो पार्षद कमल वाघेला ने निगम कर्मचारियों पर दबाव बनाकर क्लोरिन की मात्रा बढ़वा दी। इसके कारण लोगों का स्वास्थ्य और तेजी से बिगड़ने लगा। एक एनजीओ की जांच में यह तथ्य सामने आया है, लेकिन इसे छुपाया जा रहा है। जानकार बताते हैं कि पानी में तय मात्रा से ज्यादा क्लोरीन नहीं डाला जाना चाहिए। बताया जाता है कि इस संबंध में निगम कर्मचारियों ने पार्षद को जानकारी भी दी थी, लेकिन वे जलापूर्ति रुकवाने की बजाए ज्यादा क्लोरीन मिला पानी ही लोगों को पिलवाते रहे।

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