पर्यावरण संरक्षण के प्रहरी माधव गाडगिल का निधन, पश्चिमी घाट रिपोर्ट से बदली भारत की पर्यावरणीय सोच
वरिष्ठ पर्यावरणविद् और प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ. माधव गाडगिल का बुधवार, 7 जनवरी को पुणे के एक अस्पताल में निधन हो गया। वह 83 वर्ष के थे। उनका अंतिम संस्कार गुरुवार, 8 जनवरी को शाम 4 बजे किया जाएगा।
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डॉ. गाडगिल को दिसंबर 2024 में संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण एजेंसी यूएनईपी द्वारा प्रतिष्ठित ‘चैंपियन ऑफ अर्थ’ लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड देने की घोषणा की गई थी, जो उनके वैश्विक पर्यावरणीय योगदान की अंतरराष्ट्रीय पहचान है।
अपने लंबे और प्रभावशाली करियर के दौरान डॉ. गाडगिल ने राज्य और केंद्र सरकारों की अनेक नीतियों और योजनाओं के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का गहन अध्ययन किया। उन्होंने पर्यावरणीय संकटों के समाधान पर केंद्रित सात पुस्तकें और 225 से अधिक शोध पत्र लिखे।
भारत के पश्चिमी घाटों पर औद्योगिक गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन करने के लिए तैयार की गई गाडगिल रिपोर्ट को पर्यावरण क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण रिपोर्टों में गिना जाता है। वर्ष 2011 में गाडगिल समिति की इस रिपोर्ट ने देशभर में, विशेषकर पश्चिमी घाट से जुड़े राज्यों में, तीखी बहस को जन्म दिया था, जो आज भी जारी है।
गाडगिल समिति ने अपनी रिपोर्ट में सबसे पहले ‘पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र’ (ESZ) की अवधारणा सामने रखी थी। इसमें सुझाव दिया गया था कि इन क्षेत्रों का निर्धारण पश्चिमी घाट के अलग-अलग हिस्सों की जैव विविधता और मानव बस्तियों को ध्यान में रखकर किया जाए। समिति ने यह भी कहा था कि पश्चिमी घाट के कुल क्षेत्रफल का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील घोषित किया जाना चाहिए।
डॉ. माधव गाडगिल का निधन भारतीय पर्यावरण आंदोलन के लिए एक अपूरणीय क्षति माना जा रहा है, लेकिन उनके विचार और योगदान आने वाली पीढ़ियों को दिशा देते रहेंगे।



