अक्षय कुमार की केसरी चैप्टर 2 : आधी हकीकत आधा फ़साना

Date:

केसरी2 फिल्म कोर्टरूम ड्रामा है। ये फिल्म निर्देशक की रचनात्मक आजादी के दुरुपयोग का मामला भी है। आधी हकीकत है, आधा अफसाना है। अच्छी बात यह है कि फिल्म के बहाने लोगों को चित्तूर शंकरन नायर के बारे में पता चला, जिन्हें 99.99 प्रतिशत लोग नहीं जानते होंगे।
फिल्म के निर्देशन करण सिंह त्यागी खुद भी वकील हैं, कोर्ट की गतिविधियों की बारीकी जानते हैं। आम तौर पर न तो अक्षय कुमार जैसे वकील होते हैं, न ही अनन्या पांडे जैसी उनकी जूनियर। न कोर्ट रूम इतने भव्य होते हैं और वकील, वकील होते हैं, जासूस नहीं।
फिल्म दिलचस्प है, इतिहास के कुछ पन्नों को पर्दे पर उतारती है, कुछ सोचने पर मज़बूर कर देती है, जलियावाला बाग के नरसंहार की याद दिलाती है, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे, 1200 जख्मी हुए थे, मृतकों में 41 नाबालिग थे और एक बच्चे की उम्र छह सप्ताह की ही थी।
फ़िल्मी कहानी इस नरसंहार के आसपास की है। सी. शंकरन नायर जानेमाने वकील थे, कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके थे, अंग्रेजी हुकूमत के इकलौते भारतीय नगीने थे, नाइटहुड और सर की उपाधियाँ जेब में लिये घूमते थे, उनका घटनाक्रम में हृदय परिवर्तन होता है और वे जलियांवाला बाग नरसंहार के लिए जिम्मेदार ब्रिटिश अधिकारियों, विशेष रूप से जनरल रेजिनाल्ड डायर और पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’ड्वायर को अदालत में चुनौती देते हैं।
कहानी नरसंहार के बाद की जांच और कानूनी लड़ाई पर फोकस करती है, जिसमें नायर यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि यह हत्याकांड जानबूझकर किया गया था, न कि आत्मरक्षा में। नायर यानी अक्षय कुमार के सामने हैं एंग्लो इंडियन वकील नेविल मैकिनले यानी आर. माधवन। फिल्म नायर के पड़पोते रघु पलट और और उनकी पत्नी पुष्पा पलट की किताब ‘द केस दैट शूक द एम्पायर’ का रूपांतरण है। मैंने यह किताब देखी भी नहीं, पढ़ना तो दूर!
इस फिल्म और सच्चाई में कई झोल हैं ! पहला झोल तो यह है कि नायर ने जो केस लड़ा था, वह मानहानि का था, जिसमें वे हार गए थे। दूसरा झोल, केस ब्रिटेन में लंदन की किंग्स बेंच डिवीजन (हमारी हाईकोर्ट के समकक्ष) में लड़ा गया था, भारतीय कोर्ट में नहीं। नायर अंग्रेजों के खिलाफ जानबूझकर कभी भी सामने नहीं आये थे, यह सच्चाई है और यह भी कि गांधीजी ने नायर को कभी तवज्जो नहीं दी क्योंकि बापू आजादी के लिए जन आंदोलन में यकीन करते थे, कोर्ट-कचहरी बाजी में नहीं।
फिल्म जलियांवाला बाग नरसंहार जैसे संवेदनशील विषय को प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करती है। कई ऐतिहासिक तथ्यों को उजागर करती है और दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ती है। कोर्ट रूम ड्रामा के दृश्य तथ्यों और भावनाओं का शानदार संतुलन बनाते हैं। फिल्म की पटकथा तगड़ी है।
कोर्ट रूम के सीन प्रभावशाली हैं। संवाद अच्छे और सशक्त हैं, जो दर्शकों को उस दौर की पीड़ा और साहस का अहसास कराते हैं। अनन्या पांडे फिल्म की मज़बूरी है, कोई तो अभिनेत्री चाहिए ही थी !फिल्म में उनका वकील का रोल कम, और जासूस करमचंद की सहयोगी किटी का ज्यादा रहा।
फिल्म देखने में नुकसान कुछ भी नहीं है, देख लेंगे और थोड़ा गूगल और ग्रोक कर लेंगे तो दोस्तों में इतिहास का हवाला देकर ज्ञानचंद बन सकेंगे। रत्तीभर इतिहासबोध बढ़ेगा ही।
अक्षय कुमार की झेलनीय फिल्म ! केसरी 2 !

👉 यह भी पढ़ें:

Ardhendu Bhushan
Ardhendu Bhushanhttp://www.hbtvnews.com
Ardhendhu Bhushan is a senior consulting editor with extensive experience in the media industry. He is recognized for his sharp editorial insight and strategic guidance.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

Recent News
Related

Ketan Agarwal Murder Case : केतन को सिया पर हुआ था शक, पिता से पूछा भी था

इंदौर के राजा रघुवंशी की तरह पुणे में हुए केतन हत्याकांड में पुलिस पूछताछ के दौरान हर दिन नए खुलासे हो रहे हैं। अब पता चला है कि केतन को अपनी मंगेतर सिया पर शक भी हुआ था। केतन ने अपने पिता से इस संबंध में सवाल भी किए थे।