इंदौर हाई कोर्ट ने मध्य प्रदेश में भूजल नीति लागू करने के कदमों के संबंध में राज्य सरकार से जवाब मांगा है। भूजल नीति की इस मांग का संबंध भूजल स्तर में गिरावट, अंधाधुंध बोरिंग और भूजल संकट को रोकने के लिए उठाए जा रहे कदमों से है।
मध्य प्रदेश में भूजल नीति पर हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
इंदौर हाई कोर्ट की खंडपीठ ने केंद्र सरकार द्वारा 2019 में जारी राष्ट्रीय भूजल नीति के क्रियान्वयन को लेकर राज्य सरकार से कड़ा सवाल किया है। कोर्ट ने पूछा है कि अब तक इस नीति के तहत मध्य प्रदेश में क्या-क्या कदम उठाए गए हैं। यह पूछताछ भूजल संकट की गंभीरता को देखते हुए की गई है।
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जनहित याचिका में भूजल संरक्षण के निर्देश
यह मामला वर्ष 2019 की जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसे अधिवक्ता मनीष विजयवर्गीय ने भविष्य शर्मा की ओर से दायर किया था। याचिका में सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा वर्ष 1996 में जल संरक्षण के लिए व्यापक नीति बनाने के निर्देशों का हवाला दिया गया है।
राज्य सरकार का पिछला रुख और सुनवाई का इतिहास
राज्य सरकार के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि इस याचिका पर पिछली सुनवाई सितंबर 2021 में हुई थी। तब उन्होंने बताया था कि परिस्थितियां बदल गई हैं और स्थिति स्पष्ट करने के लिए उन्हें समय चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने इस बार कड़ा रुख अपनाया है।

नगर निगम और प्रशासन से रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश
न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर और न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लैई की पीठ ने नगर निगम और राज्य प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि वे शहर में अंधाधुंध बोरिंग रोकने और भूजल संरक्षण के तात्कालिक प्रयासों की रिपोर्ट प्रस्तुत करें। यह कदम भूजल संकट से निपटने के लिए आवश्यक माना जा रहा है।
आम आदमी पर भूजल नीति के प्रभाव की चिंता
भूजल नीति का प्रभाव सीधे आम जनता पर पड़ता है। यदि भूजल स्तर गिरता रहा और बोरिंग अनियंत्रित जारी रही, तो पेयजल संकट गहराएगा। इसलिए कोर्ट ने इस मामले में सख्ती दिखाते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है, ताकि जल संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाए जा सकें।
अगली सुनवाई और उम्मीदें
इंदौर हाई कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर, 2026 के लिए तय की है। तब तक राज्य सरकार को भूजल नीति के क्रियान्वयन पर विस्तृत जवाब देना होगा। कोर्ट की सख्ती से उम्मीद है कि राज्य प्रशासन जल संरक्षण के लिए प्रभावी कदम उठाएगा।



