इंदौर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना के संबंध में सुनवाई बुधवार को पूरी हो चुकी है। न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर एवं न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई की खंडपीठ ने अंतिम सुनवाई की। इस मामले में कोर्ट के अंतिम फैसले का अभी इंतजार है।
वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागड़िया, अधिवक्ता मालविका मिश्रा पॉल के साथ, प्रतिवादी क्रमांक 7 – इंदौर उत्थान अभियान समिति की ओर से उपस्थित हुए। याचिकाकर्ता द्वारा स्वयं प्रस्तुत की गई आपत्तियों का विरोध करते हुए प्रस्तावित एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना के समर्थन में विस्तृत तर्क रखे। सुनवाई के दौरान प्रस्तावित परियोजना की तकनीकी व्यवहार्यता एवं जनोपयोगिता, पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत यातायात सर्वेक्षण एवं व्यवहार्यता रिपोर्ट, इंदौर की वर्तमान यातायात आवश्यकताओं, प्रस्तावित कॉरिडोर की डिजाइन एवं कनेक्टिविटी तथा अलग-अलग चौराहों पर पृथक पारंपरिक फ्लाईओवर बनाने की तुलना में एक सतत एलिवेटेड कॉरिडोर की उपयोगिता पर विस्तार से विचार किया गया।
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एक्रोपोलिस सर्वे रिपोर्ट पर निर्भरता का सवाल
सुनवाई के दौरान प्रमुख मुद्दों में से एक याचिकाकर्ता द्वारा एक्रोपोलिस सर्वे रिपोर्ट पर की गई निर्भरता थी। वरिष्ठ अधिवक्ता बागड़िया ने तर्क दिया कि उक्त रिपोर्ट के आधार पर अकेले एलिवेटेड कॉरिडोर की व्यवहार्यता के संबंध में कोई निर्णायक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। उन्होंने न्यायालय का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि सर्वे रिपोर्ट को बाद में लोक निर्माण विभाग द्वारा आगे की तकनीकी जांच के लिए एसजीएसआईटीएस को भेजा गया था। एसजीएसआईटीएस की रिपोर्ट में मूल सर्वे डेटा में कई कमियां इंगित की गई थीं, जिनमें कथित डेटा मैनिपुलेशन, कॉपी-पेस्ट की त्रुटियां, डेटा का दोहराव तथा विभिन्न हिस्सों में विसंगतियां शामिल थीं। सुनवाई के दौरान यह तर्क दिया गया कि केवल एक्रोपोलिस सर्वे रिपोर्ट के आधार पर प्रस्तावित परियोजना के विरुद्ध कोई निर्णायक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
आईडीए की रिपोर्ट में तुलनात्मक अध्ययन नहीं
कोर्ट में यह तर्क दिया गया कि इंदौर विकास प्राधिकरण (आईडीए) की रिपोर्ट मूलतः एक व्यवहार्यता अध्ययन थी। इसमें यातायात से संबंधित कुछ आंकड़े एवं अवलोकन प्रस्तुत किए गए थे। इसमें ऐसा कोई निर्णायक तुलनात्मक आकलन नहीं किया गया था जिससे यह स्थापित हो कि एलिवेटेड कॉरिडोर की तुलना में पारंपरिक फ्लाईओवर बेहतर विकल्प होंगे। कोर्ट के समक्ष यह तर्क भी रखा गया कि उक्त आकलन उस समय किया गया था जब इंदौर में BRTS व्यवस्था अस्तित्व में थी, जबकि वर्तमान यातायात परिस्थितियां एवं यातायात का स्वरूप अब भिन्न है। इसलिए पुराने आंकड़ों की वर्तमान यातायात परिस्थितियों में प्रासंगिकता पर भी प्रश्न उठाया गया।
एलिवेटेड कॉरिडोर से यातायात सुगम होगा
सुनवाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इस आशंका से संबंधित था कि एलिवेटेड कॉरिडोर नवलखा से एलआईजी के बीच विभिन्न चौराहों पर चलने वाले कम दूरी एवं स्थानीय यातायात की आवश्यकताओं को पर्याप्त रूप से पूरा नहीं कर पाएगा। इसके जवाब में राज्य की ओर से न्यायालय को बताया गया कि प्रस्तावित परियोजना में गीता भवन पर रोटरी व्यवस्था तथा अन्य महत्वपूर्ण चौराहों पर आवश्यक आर्म्स एवं कनेक्टिविटी का प्रावधान किया गया है, जिससे स्थानीय एवं थ्रू ट्रैफिक दोनों का आवागमन सुगम हो सकेगा। वरिष्ठ अधिवक्ता बागड़िया ने तर्क दिया कि कॉरिडोर से गुजरने वाले लंबी दूरी के यातायात को एलिवेटेड स्तर पर संचालित किया जा सकेगा, जबकि नीचे की मौजूदा सड़क स्थानीय एवं कम दूरी के यातायात के लिए उपलब्ध बनी रहेगी। इस प्रकार प्रस्तावित व्यवस्था में स्थानीय एवं थ्रू ट्रैफिक को एक ही सड़क स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा करने के बजाय अलग-अलग स्तरों पर व्यवस्थित किया जा सकेगा। राज्य की ओर से यह भी जोर दिया गया कि प्रस्तावित एलिवेटेड कॉरिडोर का एक प्रमुख उद्देश्य सिग्नल-फ्री यातायात तथा मौजूदा सड़क नेटवर्क पर यातायात का बेहतर वितरण सुनिश्चित करना है।
अलग-अलग पारंपरिक फ्लाईओवर से होगी समस्या
बागड़िया ने सतत एलिवेटेड कॉरिडोर के स्थान पर अलग-अलग चौराहों पर पारंपरिक फ्लाईओवर बनाए जाने के वैकल्पिक सुझाव पर भी विस्तृत तर्क प्रस्तुत किए। यह कहा गया कि पारंपरिक फ्लाईओवर बनाए जाने की स्थिति में स्थानीय यातायात को इन संरचनाओं को पार करने अथवा इनके आसपास से निकलने के लिए अलग व्यवस्थाओं की आवश्यकता होगी। इसके लिए विभिन्न स्थानों पर अंडरपास, अतिरिक्त एप्रोच तथा अन्य यातायात प्रबंधन संबंधी अधोसंरचना बनानी पड़ सकती है। ऐसी अतिरिक्त अधोसंरचना स्वयं जमीनी स्तर पर ट्रैफिक कॉन्फ्लिक्ट पॉइंट एवं यातायात जाम की स्थिति उत्पन्न कर सकती है। दोनों विकल्पों में यातायात की आवाजाही तथा उपलब्ध सड़क क्षेत्र के तुलनात्मक उपयोग को भी माननीय न्यायालय के समक्ष चित्रों एवं उदाहरणात्मक डायग्राम के माध्यम से प्रदर्शित किया गया।
फ्लाईओवर के लिए लंबे एप्रोच की जरूरत होगी
वरिष्ठ अधिवक्ता बागड़िया ने आगे तर्क दिया कि 2 प्रतिशत की वांछनीय ग्रेडिएंट को ध्यान में रखते हुए पारंपरिक फ्लाईओवर के लिए काफी लंबे एप्रोच एवं रैम्प की आवश्यकता होगी। लगातार आने वाले चौराहों के बीच दूरी कम होने के कारण अलग-अलग फ्लाईओवर के एप्रोच एक-दूसरे से ओवरलैप अथवा हस्तक्षेप कर सकते हैं, जिससे स्थानीय यातायात के लिए पर्याप्त स्थान नहीं बचेगा और अतिरिक्त यातायात प्रबंधन संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इस स्थान संबंधी व्यावहारिक कठिनाई को भी तुलनात्मक चित्रों के माध्यम से माननीय खंडपीठ के समक्ष प्रदर्शित किया गया।
शहरों के भीतर भी बनाए जाते हैं एलिवेटेड कॉरिडोर
सुनवाई के दौरान इस तर्क पर भी विचार किया गया कि एलिवेटेड कॉरिडोर केवल शहरों के बाहर उपयोगी होते हैं और सामान्यतः शहरी क्षेत्रों के भीतर इनका निर्माण नहीं किया जाता। राज्य की ओर से न्यायालय को बताया गया कि कई शहरों की नगरीय सीमा के भीतर भी एलिवेटेड कॉरिडोर बनाए गए हैं और इस संबंध में भोपाल एवं जबलपुर सहित अन्य शहरों के उदाहरण दिए गए। बागड़िया ने प्रस्तावित इंदौर परियोजना में रोटरी एवं अन्य कनेक्टिविटी व्यवस्थाओं की ओर भी न्यायालय का ध्यान आकर्षित करते हुए बताया कि एलिवेटेड कॉरिडोर बनने के बावजूद स्थानीय यातायात की महत्वपूर्ण चौराहों तक पहुंच बनी रहेगी।
कोयंबटूर के अध्ययन का भी उल्लेख
राज्य की ओर से इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित कोयंबटूर पर आधारित एक अध्ययन का भी उल्लेख किया गया, जिसके आधार पर यह तर्क रखा गया कि उपयुक्त यातायात परिस्थितियों में एलिवेटेड कॉरिडोर पारंपरिक फ्लाईओवर की तुलना में अधिक प्रभावी हो सकता है।
अनुमानित लागत लगभग ₹350 करोड़
सुनवाई के दौरान यह आपत्ति भी उठाई गई कि परियोजना का जनरल अरेंजमेंट ड्रॉइंग (GAD) तथा अनुमानित लागत सार्वजनिक नहीं की गई है और परियोजना कथित रूप से पर्याप्त रूप से अंतिम डिजाइन के बिना आगे बढ़ाई जा रही है। राज्य की ओर से माननीय न्यायालय को स्पष्ट किया गया कि GAD पहले ही ERP पोर्टल पर अपलोड किया जा चुका है। न्यायालय को यह भी बताया गया कि प्रस्तावित परियोजना की अनुमानित लागत लगभग ₹350 करोड़ है, जिसमें ±10 प्रतिशत तक का परिवर्तन संभावित है।
पर्यावरण एवं जनस्वास्थ्य संबंधी चिंताएं भी उठीं
सुनवाई के दौरान घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्र में निर्माण कार्य के लिए फ्लाई ऐश के प्रस्तावित उपयोग को लेकर भी चिंताएं सामने रखी गईं। इसके क्रय, परिवहन एवं हैंडलिंग तथा निर्माण के दौरान प्रदूषण एवं जनस्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों से संबंधित मुद्दे भी न्यायालय के समक्ष रखे गए। अपने तर्कों का समापन करते हुए अजय बागड़िया ने प्रस्तुत किया कि याचिकाकर्ता द्वारा परियोजना से संबंधित निर्णय प्रक्रिया अथवा परियोजना को आगे बढ़ाए जाने की प्रक्रिया में किसी विशिष्ट प्रक्रियागत त्रुटि या अवैधता को न तो स्पष्ट रूप से इंगित किया गया है और न ही इस संबंध में कोई विशिष्ट अभिवचन किया गया है। इंदौर उत्थान अभियान समिति की ओर से इस प्रकार यह तर्क रखा गया कि परियोजना के विरुद्ध उठाई गई आपत्तियां मुख्यतः इंदौर की यातायात आवश्यकताओं के समाधान के लिए अपनाए जाने वाले तकनीकी एवं इंजीनियरिंग विकल्पों के बीच मतभेद से संबंधित हैं, जबकि परियोजना की निर्णय प्रक्रिया में किसी विशिष्ट अवैधता को प्रदर्शित नहीं किया गया है।



