कर्मचारीगण गृह निर्माण संस्था की वरीयता सूची पर संयुक्त आयुक्त ने भी ली थी आपत्ति, सारी आपत्तियां दरकिनार कर गए उपायुक्त

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इंदौर। वर्षों से विवादित कर्मचारीगण गृह निर्माण संस्था की वरीयता सूची को फाइनल करने में सहकारिता उपायुक्त को इतनी जल्दी थी कि उन्होंने इस पर आई सारी आपत्तियों को दरकिनार कर दिया। यहां तक कि अपने ही विभाग के वरिष्ठ अधिकारी संयुक्त आयुक्त सहकारिता बीएल मकवाना के पत्र को भी अनदेखा कर दिया। भूमाफियाओं से मिलीभगत कर उपायुक्त ने कोर्ट के बहाने अब गेंद इंदौर विकास प्राधिकरण के पाले में डाल दी है।

उल्लेखनीय है कि संयुक्त सहकारिता बीएल मकवाना ने कर्मचारीगण गृह निर्माण सहकारी संस्था की वरीयता सूची को लेकर उपायुक्त को 10 अक्टूबर 25 को एक पत्र भेजा था। इसमें उपायुक्त के 17 जून 25 के भेजे पत्र का हवाला दिया गया था। उपायुक्त ने इस पत्र के माध्यम से कर्मचारीगण गृह निर्माण सहकारी संस्था की वरीयता सूची आईडीए को भेजने का अनुरोध किया था। संयुक्त आयुक्त ने इसको लेकर आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा था कि उपरोक्त प्रेषित सूची के संबंध में परीक्षण दल द्वारा 25 नवंबर 2024 को प्रस्तुत प्रतिवेदन में दी गई जानकारी सुस्पष्ट नहीं है।

ऑडिट को लेकर उठाई थी आपत्ति

मकवाना ने अपने पत्र में संस्था के ऑडिट और सदस्यों की संख्या को लेकर आपत्ति उठाई थी। पत्र में कहा गया था कि 2008-09 के ऑडिट के आधार पर ही आगे ऑडिट होना था, जो नहीं हुआ है। इसमें यह भी कहा गया था कि सदस्यता सूची के सभी 311 सदस्यों को प्रकाशित वरीयता सूची में शामिल नहीं किया गया, इस पर स्पष्टीकरण मांगा गया था।

सदस्यों की संख्या में होता रहा हेरफेर

संयुक्त आयुक्त के पत्र के अनुसार 12 जुलाई 23 को संस्था के सदस्यों की संख्या 207 रही, जबकि संस्था की प्रचलित उपविधि क्र. 7(4) में सदस्य संख्या 231 तक निर्धारित है। इतना ही नहीं द्वितीय विशेष अंकेक्षण वर्ष 2008-09 में संलग्न सदस्यता सूची अनुसार सभी 311 सदस्यों को शामिल नहीं किया गया है। मकवाना ने अपने पत्र में लिखा था कि संस्था द्वारा करवाया गया अंकेक्षण नियमों के विपरीत होना पाया गया।

ईओडब्ल्यू की शिकायत का भी दिया हवाला

संयुक्त आयुक्त ने अपने पत्र में लिखा था कि संस्था द्वारा इन्दौर विकास प्राधिकरण को प्रेषित 80 सदस्यों की वरीयता सूची के संबंध में राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरों के समक्ष शिकायत प्रस्तुत की गई। ब्यूरो द्वारा उक्त शिकायत को प्राथमिक शिकायत क्र. 26/2009 में दर्ज कराई गई। विवेचना उपरांत ब्यूरों द्वारा अपराध क्रमांक 26/2015, धारा 420, 409, 120-बी, 34 भा.द.वि., 13 (1) (डी), 13 (2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत दर्ज की जाकर विवेचना की जा रही है। जिला कार्यालय को परीक्षण दल द्वारा 28 दिसंबर 2023 को पत्र प्रेषित कर वरीयता सूची के परीक्षण के संबंध में पत्र भेजा गया था। संयुक्त आयुक्त के पत्र में संस्था द्वारा 80 व्यक्तियों को सदस्य नहीं मानने के मामले में हाईकोर्ट में चलर रहे प्रकरण का भी हवाला दिया गया था।

बालेश चौरसिया की आपत्ति का भी जिक्र

संयुक्त आयुक्त के पत्र में लिखा गया है कि बालेश चौरसिया द्वारा आपत्ति प्रस्तुत कर नाम जोड़े जाने हेतु आवेदन प्रस्तुत किया गया था। रजिस्ट्रीकरण अधिकारी द्वारा सुनवाई उपरांत बालेश चौरसिया के आवेदन को निरस्त करते हुए सदस्यता सूची में नाम नहीं जोड़ा गया। उक्त आपत्ति निराकरण के विरूद्ध अपीलीय अधिकारी, उपायुक्त, सहकारिता, जिला इन्दौर के समक्ष प्रस्तुत अपील में 13 सितंबर 2022 से अपील निरस्त की गई। पत्र में यह भी लिखा गया है कि वरीयता सूची प्रकाशन के संबंध में बालेश चौरसिया द्वारा सहकारिता विभाग को शिकायत की गई थी। पत्र में चौरसिया द्वारा हाई कोर्ट में दायर प्रकरण का भी हवाला दिया गया है।

80 सदस्यों द्वारा जमा राशि की हेराफेरी

संयुक्त आयुक्त के पत्र में लिखा गया है कि संस्था के 80 सदस्यों की राशि जमा होने के उपरांत भी आर.डी. शेगांवकर द्वारा रिकॉर्ड में हेराफेरी कर, सदस्यों के नाम जमा राशि संस्था के रिकॉर्ड में जमा नहीं की गई। इसकी जांच आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ भोपाल द्वारा की जा रही है, इस संबंध में वस्तुस्थिति स्पष्ट करें। आर.डी. शेगांवकर द्वारा संस्था के 80 सदस्यों के विरुद्ध क्या कार्रवाई की गई एवं तत्कालीन उपायुक्त, सहकारिता, जिला इन्दौर एवं तत्कालीन सहकारी निरीक्षक व प्रभारी अधिकारी सुरेंद्र जैन द्वारा 80 सदस्यों को निष्कासित करने एवं निर्वाचन की क्या प्रक्रिया अपनाई गई। इस संबंध में वस्तुस्थिति स्पष्ट करने को कहा गया है।

पत्र में चुनाव प्रक्रिया पर भी उठाए थे सवाल

संयुक्त आयुक्त केपत्र में संस्था के चुनाव को लेकर भी सवाल उठाए गए थे। पत्र में पूछा गया है कि संस्था के निर्वाचन कब-कब संपन्न हुए, निर्वाचन की क्या प्रक्रिया अपनाई गई, निर्वाचन किस प्रशासक / अध्यक्ष द्वारा संपन्न कराए गए, कर्मचारीगण संस्था के निर्वाचन वर्ष 2007-08 से वर्ष 2009 तक, अंकेक्षण उपरांत किए गए या उसके पूर्व किए गए। इस संबंध में वस्तुस्थिति स्पष्ट की जाए। पत्र में यह भी पूछा गया था कि इंदौर विकास प्राधिकरण में जिला कार्यालय स्तर से संस्था सदस्यों की वरीयता सूची कब-कब प्रेषित की गई तथा उन दिनांक में संस्था में प्रशासक कौन थे एवं उसकी नियुक्ति कब की गई। यदि अध्यक्ष थे, तो कौन थे, उनके द्वारा इस संबंध में क्या कार्यवाहियां की गई। इस संबंध में वस्तुस्थिति स्पष्ट की जाए।

संयुक्त आयुक्त ने वापस कर दी थी सूची

संयुक्त आयुक्त ने वरीयता सूची को वापस करते हुए सारे बिन्दुओं पर जवाब मांगा था। पत्र में ईओडब्ल्यू सहित सारे न्यायिक प्रकरणों की स्थिति स्पष्ट कर फिर से सूची मांगी गई थी। सूत्र बताते हैं कि संयुक्त आयुक्त के इस पत्र को दरकिनार कर वरीयता सूची कोर्ट के माध्यम से आईडीए में पहुंचा दी गई है।

पूर्व उप अंकेक्षक के इशारे पर सारा खेल

सूत्र बताते हैं कि वरीयता सूची का यह सारा खेल सहकारिता विभाग के ही एक पूर्व उप अंकेक्षक के इशारे पर हुआ है। इस उप अंकेक्षक पर ईओडब्ल्यू के अलावा कई अन्य प्रकरण दर्ज हैं और जांच चल रही है। खास बात यह कि कभी वे इसी संस्था के उप अंकेक्षक भी थे।

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