मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने CMHO और OIC पर 3 लाख का जुर्माना लगाया है, जो 329 दिन की देरी पर सख्त कार्रवाई के तहत आया है। यह जुर्माना ग्वालियर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. एमएस सागर और मामले के प्रभारी अधिकारी (OIC) को व्यक्तिगत रूप से अपनी जेब से जमा करना होगा। कोर्ट ने इस देरी को लापरवाही नहीं, बल्कि जानबूझकर की गई ‘सेटिंग’ बताया है।
329 दिन की देरी के कारण हुई सख्त कार्रवाई
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने इस मामले में 329 दिन की भारी देरी पर कड़ी नाराजगी जताई। यह देरी दिवंगत कर्मचारी देवेंद्र सिंह परमार के पक्ष में आए सिंगल बेंच के फैसले के खिलाफ दायर रिट अपील में हुई। कोर्ट ने पाया कि अधिकारियों ने जानबूझकर अपील को समय सीमा के बाद दाखिल किया, जिससे वह तकनीकी आधार पर खारिज हो सके।
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इस कारण डिवीजन बेंच ने CMHO और OIC पर ₹3 लाख का जुर्माना लगाया और साथ ही विभागीय जांच के आदेश भी दिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि जुर्माना सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि अधिकारियों को अपनी निजी जेब से जमा करना होगा।

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी और OIC की भूमिका
ग्वालियर के CMHO डॉ. एमएस सागर और प्रभारी अधिकारी ने अपील में देरी का कोई संतोषजनक कारण प्रस्तुत नहीं किया। कोर्ट ने उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह व्यवहार लापरवाही से बढ़कर है। उन्होंने सामान्य और अस्पष्ट आवेदन दाखिल किया, जिससे मामला अनावश्यक रूप से लंबित रहा।
कोर्ट की युगल पीठ ने इसे गंभीर अनुशासनहीनता माना और जुर्माने के साथ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की। यह संकेत है कि सरकारी अधिकारियों के व्यवहार में जवाबदेही और समयबद्धता आवश्यक है।
स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव को निर्देश
हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव को जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच कराने और 30 दिन के भीतर एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR) पेश करने का निर्देश दिया है। यह कदम अधिकारियों की लापरवाही पर कड़ी नज़र रखने का संकेत है।
इसके अलावा, कोर्ट ने 7 दिनों में जुर्माना जमा करने का आदेश दिया है। इस तरह से अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी के प्रति लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी प्रक्रिया
यह मामला दिवंगत कर्मचारी देवेंद्र सिंह परमार के सेवा समाप्ति से जुड़ा है। उनकी नियुक्ति 1989 में एलडीसी पद पर हुई थी। राज्य स्तरीय स्क्रीनिंग कमेटी ने उनकी सेवाओं को वैध माना। बावजूद इसके, मार्च 2016 में विभाग ने उन्हें नोटिस जारी किया और दिसंबर 2017 से जनवरी 2018 के बीच उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं।
देवेंद्र सिंह परमार ने इस सेवा समाप्ति के खिलाफ हाईकोर्ट से न्याय की गुहार लगाई। सिंगल बेंच ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया, जिसे चुनौती देने के लिए राज्य शासन ने रिट अपील दायर की। इस अपील में 329 दिन की देरी हो गई, जिससे अदालत ने सख्त रुख अपनाया।
आम जनता पर असर और प्रशासनिक जवाबदेही
इस फैसले से यह स्पष्ट संदेश गया है कि सरकारी अधिकारियों को अपने कर्तव्यों में सावधानी बरतनी होगी। लंबे समय तक मामलों में देरी से जनता का न्याय मिलने में बाधा आती है।
साथ ही, यह जुर्माना व्यक्तिगत स्तर पर अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराने का उदाहरण है। इससे भविष्य में प्रशासनिक लापरवाही में कमी आने की संभावना है, जो आम जनता के हित में होगा।
आने वाली सुनवाई और संभावित प्रभाव
इस मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर को निर्धारित है। तब कोर्ट विभागीय जांच की रिपोर्ट की समीक्षा करेगा। इसके अलावा, यह भी देखा जाएगा कि स्वास्थ्य विभाग ने क्या कार्रवाई की है।
संभावित है कि इस फैसले से अन्य विभागों में भी जवाबदेही और समयबद्धता के उपाय बढ़ेंगे। न्यायपालिका की इस सख्ती से प्रशासनिक स्तर पर सुधार की उम्मीद जगती है।



