बारामूला में फारूक अब्दुल्ला ने अपने संबोधन में हक की लड़ाई को लेकर स्पष्ट संदेश दिया। 24 अक्टूबर 2026 को नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने बारामूला स्थित डाक बंगले में पार्टी कार्यकर्ताओं के सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को अपने हक की लड़ाई के लिए एकजुट होकर संघर्ष तेज करना होगा।
फारूक अब्दुल्ला ने हक की लड़ाई में एकजुटता का आह्वान किया
डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने जोर देकर कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोग अपने अधिकारों और विशिष्ट पहचान की रक्षा के लिए एक साथ खड़े हों। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि वे अपनी हक की लड़ाई में हिम्मत नहीं दिखाएंगे तो उनका अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। उन्होंने कहा, “हक के लिए लड़ो, वरना मिट जाओगे।” यह आह्वान उनकी पार्टी की राजनीतिक रणनीति और भविष्य के संघर्ष का संकेत है।
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अनुच्छेद 370 और राज्य का दर्जा बहाल करने का संकल्प
अपने संबोधन में फारूक अब्दुल्ला ने अगस्त 2019 में हटाए गए अनुच्छेद 370 की पुनः बहाली और जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस दिलाने की बात दोहराई। उन्होंने केंद्र सरकार पर वादाखिलाफी करते हुए आरोप लगाया कि चुनावों और परिसीमन के बाद भी राज्य का दर्जा बहाल नहीं किया गया। उनका कहना था कि यह जम्मू-कश्मीर की विशिष्ट पहचान को कमजोर करने का प्रयास है।
धार्मिक और क्षेत्रीय मतभेदों से ऊपर उठकर एकता की जरूरत
फारूक अब्दुल्ला ने समुदायों और वर्गों के बीच धार्मिक और क्षेत्रीय मतभेदों को भुलाकर एकजुट होने की अपील की। उन्होंने कहा कि जब तक लोग एक नहीं होंगे, तब तक हक की लड़ाई में सफलता संभव नहीं। उनका यह संदेश जम्मू-कश्मीर की सामाजिक समरसता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
केंद्र सरकार और भाजपा पर कड़ी आलोचना
उन्होंने केंद्र सरकार और भाजपा पर जम्मू-कश्मीर की पहचान कमजोर करने और वादाखिलाफी करने का आरोप लगाया। साथ ही भाजपा शासित राज्यों में मुस्लिम संपत्तियों और धार्मिक स्थलों पर चलाए जा रहे बुलडोजर अभियानों की आलोचना की। फारूक ने कहा कि यह नीतियां समाज में विभाजन पैदा करती हैं और जम्मू-कश्मीर के लोगों के अधिकारों के लिए खतरा हैं।

मीडिया स्वतंत्रता और प्रशासनिक मुद्दों पर सवाल
फारूक अब्दुल्ला ने मीडिया की स्वतंत्रता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की आजादी जरूरी है और इसे दबाया नहीं जाना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मेडिकल संस्थानों की स्वायत्तता कम करने तथा अन्य प्रशासनिक फैसलों पर भी चिंता जताई। उन्होंने इस बात पर भी सवाल किया कि महत्वपूर्ण मामलों में निर्णय लेने में देरी क्यों हो रही है।
कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का संदर्भ और राजनीतिक विवाद
अपने संबोधन के दौरान फारूक अब्दुल्ला ने पाकिस्तान का भी उल्लेख किया और कहा कि पाकिस्तान विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाता है, जिससे कश्मीरियों की सुरक्षा बनी रहती है। उन्होंने भारत की नीयत पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि ऐसा नहीं होता तो कश्मीरियों के लिए हालात और कठिन होते। इस बयान के बाद जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
आगे की चुनौतियां और हक की लड़ाई का भविष्य
फारूक अब्दुल्ला द्वारा हक की लड़ाई को तेज करने के आह्वान से यह स्पष्ट होता है कि जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक परिदृश्य में आगामी दिनों में सक्रिय संघर्ष जारी रहेगा। इससे आम लोगों की जिंदगी पर भी प्रभाव पड़ेगा, खासकर राजनीतिक स्थिरता और सामाजिक एकता के संदर्भ में। इस लड़ाई का अंत किस दिशा में होगा, यह समय ही बताएगा, लेकिन कार्यकर्ताओं और जनता की एकजुटता इस संघर्ष की कुंजी होगी।



