दिल्ली के लोगों को ‘कड़वी’ लगने लगी थी केजरीवाल की मुफ्त ‘रेवड़ियां’

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दिल्ली के लोगों को ‘कड़वी’ लगने लगी थी केजरीवाल की मुफ्त ‘रेवड़ियां’
दिल्ली के लोगों को ‘कड़वी’ लगने लगी थी केजरीवाल की मुफ्त ‘रेवड़ियां’

नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम सामने हैं। एग्जिट पोल के अनुमानों के मुताबिक भाजपा ने आम आदमी पार्टी को दिल्ली की सत्ता से बाहर कर गद्दी पर कब्जा जमा लिया है। करीब 27 साल के बाद भाजपा की दिल्ली में वापसी हुई है। यह चुनाव परिणाम अप्रत्याशित नहीं कहे जाएंगे, क्योंकि जिस ईमानदारी के दम पर अरविंद केजरीवाल को लोगों ने दिल्ली की चाबी दी थी, वे उसे खो चुके थे। इसी सरकार पर सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार के आरोप लगे होंगे और खुद केजरीवाल समेत कई मंत्री जेल की हवा खा चुके हैं। ऐसे में दिल्ली की जनता को केजरीवाल की ईमानदारी पर शक नहीं करने की कोई गुंजाइश नहीं बची थी।

केजरीवाल को दिल्ली की जनता ने बार-बार मौका दिया। इस बीच कोई काम नहीं हुआ। न यमुना की सफाई हुई, न दिल्ली साफ हुई और न ही बाकी बुनियादी सुविधाएं मिलीं। इन सब की असफलता का आरोप केजरीवाल केंद्र सरकार और उपराज्यपाल (एलजी) पर लगाते रहे। पहले तो लोग भरोसा करते रहे, लेकिन एलजी बदलने के बाद भी यही सिलसिला जारी रहा। जब उन्होंने कहा कि यमुना के पानी में हरियाणा सरकार जहर मिला रही तो लोगों को यह साफ लगने लगा कि वे झूठ बोल रहे हैं।

भाजपा ने केजरीवाल की छवि को पूरी तरह से नंगा करके रख दिया। शीशमहल के मुद्दे के माध्यम से जनता को यह समझाने की कोशिश की गई कि केजरीवाल जो खुद को बताते हैं वे वैसे हैं नहीं। केजरीवाल ने वीआईपी कल्चर खत्म करने की बात कही थी, लेकिन उन्होंने इसे अन्य नेताओं से बढ़कर अपनाया। इसी का नतीजा है कि केजरीवाल अपनी सीट नहीं बचा पाए। उन्होंने अपने सबसे करीबी मनीष सिसोदियो को बचाने के लिए उनकी सीट बदल दी थी, लेकिन नई विधानसभा में भी सिसोदियो को हार का सामना करना पड़ा।

केजरीवाल इस बार भी मुफ्त की योजनाओं को भरोसे थे। मध्यप्रदेश, झारखंड तथा अन्य राज्यों की तरह महिलाओं को हर महीने 2100 रुपए देने की घोषणा भी की थी, लेकिन वे ऐसा कर नहीं पाए। दूसरी तरफ भाजपा और कांग्रेस ने भी अपने घोषणा पत्र में केजरीवाल से बढ़-चढ़कर मुफ्त की योजनाओं की घोषणा कर दी। इस बीच केजरीवाल यह कहते रहे कि भाजपा आ गई तो सारी योजनाएं बंद हो जाएंगी, लेकिन लोगों को इस पर भरोसा नहीं हुआ।

खैर, भाजपा चुनाव जीत चुकी है, लेकिन उसे भी सावधान रहने की जरूरत है। भाजपा को वर्ष 1993 याद रखना होगा, जब दिल्ली की गद्दी उसे मिली थी। 49 सीटें जीतने के बाद बी भाजपा को 5 साल में तीन सीएम बनाने पड़े थे।

जनता ने 27 साल बाद मौका दिया है…इस बार सिर्फ जुमलों से काम नहीं चलेगा…कुछ कर दिखाना होगा और दिल्ली की जनता को यह एहसास कराना होगा कि उन्होंने गलत फैसला नहीं लिया है।

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