अलविदा ‘भारत कुमार’…फिल्मों में अंग्रेजों से पंगा लेते रहने वाले एक्टर-डायरेक्टर मनोज कुमार ने इमरजेंसी के समय इंदिरा गांधी से ले लिया था पंगा

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इंदौर। बॉलीवुड के प्रसिद्ध एक्टर-डायरेक्टर मनोज कुमार का निधन हो गया है। 87 साल की उम्र में मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। शहीद, उपकार, पूरब और पश्चिम और रोटी कपड़ा और मकान, क्रांति जैसी फिल्मों से देशभक्ति की भावना जगाने वाले इस अभिनेता को भारत कुमार के नाम से भी पहचाना जाता था। मनोज कुमार स्वभाव से जिद्दी भी थे। अपनी फिल्मों में अंग्रेजों से पंगा लेने वाले मनोज कुमार ने इमरजेंसी के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भी ले लिया था पंगा।
बताया जाता है कि पहले मनोज कुमार के इंदिरा गांधी से अच्छे संबंध थे, लेकिन आपातकाल के बाद इसमें खटास आ गई। मनोज कुमार ने आपातकाल का खुलकर विरोध किया। इसके बाद क्या था मनोज कुमार की फिल्में संकट में आने लगीं। उनकी फिल्म दस नंबरी को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने बैन कर दिया। इसके बाद रिलीज हुई फिल्म शोर का भी ऐसा ही हाल हुआ। मनोज कुमार ने ही इसका निर्माण और निर्देशन भी किया था। इस फिल्म के रिलीज होने से पहले ही इसे दूरदर्शन पर दिखाया गया, जिसकी वजह से फिल्म सिनेमाघरों में कमाई नहीं कर पाई और इसे भारी नुकसान का सामना करना पड़ा। ऐसे में मनोज कुमार के पास कोई चारा नहीं बचा और उन्होंने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने कई हफ्तों तक कोर्ट के चक्कर लगाए, लेकिन इससे उन्हें फायदा हुआ और फैसला उनके पक्ष में आया।
आपातकाल पर फिल्म बनाने से किया इनकार
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने उन्हें आपातकाल पर फिल्म बनाने का ऑफर दिया, लेकिन मनोज ने इसे ठुकरा दिया। इस फिल्म की स्क्रिप्ट अमृता प्रीतम लिख रही थीं और यह एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म होने वाली थी। जब मनोज को इस बारे में पता चला तो उन्होंने अमृता प्रीतम से भी भिड़ लिए। यह फिल्म बनी ही नहीं।
देशभक्ति की फिल्मों ने दिया भारत कुमार नाम
24 जुलाई 1937 को हरिकृष्ण गिरि गोस्वामी के रूप में जन्मे मनोज कुमार हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता थे। उन्हें देशभक्ति थीम वाली फ़िल्मों में अभिनय और निर्देशन के लिए जाना जाता था। इसमें शहीद (1965), उपकार (1967), पूरब और पश्चिम (1970) और रोटी कपड़ा और मकान (1974) शामिल हैं। इन फिल्मों की वजह से ही उन्हें भारत कुमार भी कहा जाता था। उन्होंने हरियाली और रास्ता, वो कौन थी, हिमालय की गोद में, दो बदन, पत्थर के सनम, नील कमल और क्रांति जैसी चर्चित फिल्म बनाई। वे आखिरी बार बड़े पर्दे पर 1995 में आई फिल्म मैदान-ए-जंग में नजर आए थे। मनोज कुमार को 1992 में पद्म श्री और 2015 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
लाल बहादुर शास्त्री के कहने पर बनाई उपकार
उल्लेखनीय है कि मनोज कुमार ने लाल बहादुर शास्त्री के कहने पर 1967 में उपकार फिल्म बनाई थी, हालांकि शास्त्री जी इसे देख नहीं पाए थे। फिल्म की रिलीज से पहले ही शास्त्री जी का निधन हो गया था। उन्होंने आखिरी बार फिल्म मैदान-ए-जंग में अभिनय किया था, जबकि 1999 में उन्होंने जय हिंद में आखिरी बार निर्देशन किया। फिर उन्होंने फिल्मों से दूरी बना ली थी।
पद्मश्री से लेकर फाल्के पुरस्कार तक
भारतीय सिनेमा में अपने शानदार योगदान के लिए मनोज कुमार ने कई अवॉर्ड अपने नाम किए हैं। भारत सरकार ने उन्हें 1992 में पद्मश्री और 2016 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया। इसके अलावा, उन्हें 7 फिल्म फेयर अवॉर्ड भी मिले, जिनमें 1968 में उपकार के लिए बेस्ट फिल्म, बेस्ट डायरेक्टर, बेस्ट स्टोरी और बेस्ट डायलॉग के अवॉर्ड शामिल हैं। उन्हें एक नेशनल अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया है।
लाइट टेस्टिंग ने बदल दी किस्मत
मनोज कुमार शुरुआत में बहुत छोटे-छोटे काम किए। स्टूडियो में उन्हें लाइट और फिल्म शूटिंग में लगने वाले दूसरे सामानों को ढोने का काम मिला। धीरे-धीरे मनोज के काम से खुश होकर उन्हें फिल्मों में सहायक का काम मिला। फिल्मों के सेट पर बड़े-बड़े कलाकार अपना शॉट शुरू होने से कुछ देर पहले ही स्टूडियो आते थे। ऐसे में हीरो पर पड़ने वाली लाइट चैक करने के लिए मनोज कुमार को हीरो की जगह खड़ा कर दिया जाता था। एक दिन जब लाइट टेस्टिंग के लिए मनोज कुमार हीरो की जगह खड़े हुए थे। लाइट पड़ने पर उनका चेहरा कैमरे में इतना आकर्षक लग रहा था कि एक डायरेक्टर ने उन्हें 1957 में आई फिल्म फैशन में एक छोटा सा रोल दे दिया। इसके बाद क्या था मनोज कुमार ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

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