मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। केंद्रीय राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन (George Kurian) ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है, जिसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने तत्काल प्रभाव से मंजूर कर लिया है। कुरियन केंद्र सरकार में मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय तथा अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में कार्यरत थे।
राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सलाह पर इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है।
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आखिर क्यों देना पड़ा इस्तीफा?
जॉर्ज कुरियन को 27 अगस्त 2024 को मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुना गया था। उनका कार्यकाल 4 सितंबर 2024 से शुरू हुआ था। यह सीट केंद्रीय मंत्री Jyotiraditya Scindia के लोकसभा के लिए निर्वाचित होने के बाद खाली हुई थी।
हालांकि हाल ही में हुए राज्यसभा चुनावों में बीजेपी ने उन्हें दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया। इसके चलते उनका राज्यसभा कार्यकाल समाप्त हो गया और वे संसद के किसी भी सदन के सदस्य नहीं रहे। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार मंत्री बने रहने के लिए संसद का सदस्य होना आवश्यक होता है, इसलिए उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ा।
मोदी कैबिनेट में शामिल होने पर क्यों हुई थी चर्चा?
जब जून 2024 में मोदी सरकार 3.0 का गठन हुआ और केरल के वरिष्ठ बीजेपी नेता जॉर्ज कुरियन को मंत्रिमंडल में जगह मिली, तो राजनीतिक गलियारों में काफी चर्चा हुई थी। उस समय उनका नाम मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने की कोई खास अटकलें नहीं थीं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि बीजेपी ने केरल विधानसभा चुनाव 2026 और राज्य में अपने विस्तार की रणनीति के तहत यह कदम उठाया था।
ईसाई वोट बैंक को साधने की बीजेपी की रणनीति?
केरल में लगभग 17 प्रतिशत आबादी ईसाई समुदाय की है। 2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी को पहली बार केरल में बड़ी सफलता मिली, जब अभिनेता-राजनेता Suresh Gopi ने त्रिशूर सीट पर 74 हजार से अधिक वोटों से जीत दर्ज की।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ईसाई समुदाय के एक वर्ग का समर्थन बीजेपी की इस सफलता में महत्वपूर्ण रहा। ऐसे में जॉर्ज कुरियन को मंत्री बनाकर पार्टी ने अल्पसंख्यक और विशेष रूप से ईसाई मतदाताओं को सकारात्मक संदेश देने की कोशिश की थी।
कौन हैं जॉर्ज कुरियन?
जॉर्ज कुरियन बीजेपी के पुराने और अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं। 1980 में बीजेपी की स्थापना के समय ही वे पार्टी से जुड़ गए थे। अपने लंबे राजनीतिक सफर में उन्होंने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में भी काम किया। इसके अलावा अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान रेल राज्य मंत्री रहे O. Rajagopal के ओएसडी (विशेष कार्याधिकारी) की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं।
क्या यह सिर्फ संवैधानिक मजबूरी है या बीजेपी की नई राजनीतिक रणनीति?
जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा तकनीकी और संवैधानिक कारणों से हुआ है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे केरल की बदलती राजनीति, अल्पसंख्यक वोट बैंक और बीजेपी की भविष्य की रणनीति से भी जोड़कर देख रहे हैं। अब सवाल यह है कि क्या बीजेपी आने वाले दिनों में केरल में कोई नया बड़ा चेहरा सामने लाने जा रही है?
आपका क्या मानना है?
क्या जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा केवल संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है, या फिर इसके पीछे बीजेपी की कोई बड़ी राजनीतिक रणनीति छिपी है? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।



