भारत में हर साल भारी मात्रा में खतरनाक औद्योगिक कचरा पैदा हो रहा है, लेकिन आधिकारिक आंकड़ों में बेहद कम प्रदूषित स्थलों का दर्ज होना गंभीर चिंता पैदा कर रहा है। एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में यह सामने आया है कि देश में हर वर्ष लगभग 1.566 करोड़ मीट्रिक टन खतरनाक कचरा उत्पन्न हो रहा है।
यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन ने इस बड़े अंतर को बेहद चिंताजनक बताया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह संकेत देता है कि देश में बड़ी संख्या में ऐसे प्रदूषित क्षेत्र मौजूद हो सकते हैं, जिनकी अभी तक पहचान ही नहीं हो पाई है।
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एनवायर्नमेंटल डेवलपमेंट में प्रकाशित इस अध्ययन में कहा गया है कि यह समस्या केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव स्वास्थ्य, भूजल, खाद्य सुरक्षा और वन्यजीवों के लिए भी दीर्घकालिक खतरा बन सकती है।
प्रदूषित भूमि उन क्षेत्रों को कहा जाता है, जहां मिट्टी, भूजल या जमीन के नीचे जहरीले रसायनों का जमाव हो जाता है। यह स्थिति आमतौर पर औद्योगिक गतिविधियों, फैक्ट्रियों, खनन और खतरनाक कचरे के गलत निपटान के कारण पैदा होती है। ऐसे कचरे में सीसा, पारा और कैडमियम जैसी भारी धातुएं शामिल होती हैं, जो कम मात्रा में भी शरीर के लिए बेहद नुकसानदेह साबित हो सकती हैं।
शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि भारत में प्रदूषित भूमि से जुड़ी नीतियां अलग-अलग विभागों में बंटी हुई हैं। कहीं मिट्टी की गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाता है तो कहीं कचरे के निपटान पर, जिससे समग्र तस्वीर साफ नहीं हो पाती।
अध्ययन में अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि वहां प्रदूषित भूमि की पहचान और सफाई के लिए मजबूत व्यवस्था मौजूद है। नियमित निगरानी, सख्त कानून और वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर काम किया जाता है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि भारत भी ऐसे प्रभावी मॉडल अपनाता है, तो वह अपने प्रदूषित क्षेत्रों की सही पहचान कर उन्हें सुरक्षित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा सकता है।


