देश की कई राज्य सरकारें बुलडोजर के कारण रातोंरात फेमस हो रही थीं। अपराध पर अंकुश लगाने में भले ही असफल रही हों, लेकिन किसी आरोपी का मकान तोड़ने में एक मिनट भी नहीं लगाती थीं। शुरुआत उत्तरप्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने की थी। किसी भी अपराध में आरोपी का नाम आते ही योगी का बुलडोजर उसके घर पर पहुंच जाता था और मिनटों में उसका मकान मलबे में बदल जाता था।
उत्तरप्रदेश में बुलडोजर एक्शन से सीएम योगी की बढ़ती लोकप्रियता देख अन्य राज्य सरकारों ने भी इसे अपना लिया। यह बुलडोजर मध्यप्रदेश भी पहुंचा और यहां भी इसे काफी लोकप्रियता मिली। फिर यह राजस्थान, गुजरात होता हुआ अन्य कई प्रदेशों में पहुंच गया। ऐसी कार्रवाई में कई बेगुनाहों के मकान भी टूटे। बिना सुनवाई, बिना तारीख सरकारें खुद ही सुप्रीम कोर्ट बन फैसले लेने लगीं।
👉 यह भी पढ़ें:
- मीनाक्षी नटराजन के नामांकन विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई कल, नाम वापसी की आखिरी तारीख आज
- इश्क करो पार्टी’ से राजनीति में एंट्री! पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज मार्कंडेय काटजू का बड़ा दांव, क्या बदल जाएगा राजनीतिक नैरेटिव?
- विनेश फोगाट को सुप्रीम कोर्ट से भी एशियन गेम्स के ट्रायल में शामिल होने की मिली मंजूरी
- आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: खाना खिलाने वालों की भी तय होगी जिम्मेदारी
- टीएमसी को सुप्रीम कोर्ट से झटका, कोर्ट ने मतगणना में केंद्रीय कर्मचारियों की नियुक्ति को सही ठहराया
- सुप्रीम कोर्ट में बोले कांग्रेस नेता पवन खेड़ा-मुझे गिरफ्तार कर जलील करने की जरूरत नहीं
ऐसी कार्रवाईयों पर खूब शोर भी हुआ। कांग्रेस सहित कई दलों ने यूपी सहित अन्य भाजपा सरकारों पर एक वर्ग विशेष को टारगेट करने के आरोप भी लगाए। हालांकि बहुत सारे हिंदू अपराधियों के मकान भी तोड़े गए, लेकिन इस तरह के फैसले तालिबानी ही कहे जाएंगे। जब आपके पास पुलिस है, कोर्ट है, कानून है तो आप ऐसे फैसले कैसे ले सकते हो।
बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी यही तो कहा। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक कार्यों को न्यायपालिका को सौंपा गया है और न्यायपालिका की जगह पर कार्यपालिका को यह काम नहीं करना चाहिए। जो सरकारी अधिकारी कानून को अपने हाथ में लेकर इस तरह के अत्याचार करते हैं, उन्हें जवाबदेही के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि किसी आरोपी या फिर गुनहगार के घर को सिर्फ इस आधार पर नहीं गिराया जा सकता कि संबंधित व्यक्ति की आपराधिक पृष्ठभूमि है। इस तरह की कार्रवाई गैरकानूनी और असंवैधानिक है। कोर्ट ने कहा कि किसी का घर उसकी उम्मीद होती है। हर किसी का सपना होता है कि उसका आश्रय कभी न छिने। ऐसे में इस तरह की कार्रवाई को उचित नहीं ठहराया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए गाइडलाइन जारी कर दी है। 15 दिन पहले नोटिस देना होगा। विधिवत सुनवाई होगी और जो भी फैसला होगा वह भी पोर्टल पर प्रदर्शित किया जाएगा। गाइडलाइन का पालन नहीं करने पर संबंधित पर कार्रवाई का प्रावधान भी किया गया है।
अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले से राज्य सरकारों के राजनीतिक बुलडोजर पर रोक लग गई है और यह तय हो गया है कि अब किसी बेगुनाह का घर नहीं टूटेगा। अब राज्य सरकारों को सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए कोई दूसरा रास्ता तलाशना होगा। खैर, यूपी सरकार के पास अपराधियों के गाड़ी पलटाने का रास्ता तो है ही…



