देश की राजनीति में एक ऐसा नाम अचानक सुर्खियों में आ गया है, जिसकी पहचान अब तक अदालत और विवादित बयानों से जुड़ी रही है। पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज मार्कंडेय काटजू ने अब “इश्क करो पार्टी” नाम से नई राजनीतिक पहल की घोषणा कर सबको चौंका दिया है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर किए गए अपने ऐलान में काटजू ने युवाओं को पार्टी से जुड़ने का न्योता देते हुए “Make Love, Not War” का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि देश में बढ़ती नफरत, टकराव और राजनीतिक ध्रुवीकरण के माहौल के बीच प्यार, भाईचारे और मानवीय रिश्तों को मजबूत करने की जरूरत है।
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हालांकि, पार्टी के नाम ने जितनी तेजी से लोगों का ध्यान खींचा, उतनी ही तेजी से सोशल मीडिया पर मीम्स और बहसों का दौर भी शुरू हो गया।

कई यूजर्स ने इसकी तुलना हाल ही में चर्चित “कॉकरोच जनता पार्टी” (CJP) से कर दी। इतना ही नहीं, काटजू ने खुद भी युवाओं से अपील करते हुए कहा कि “कॉकरोच वाली बातें भूल जाओ और इश्क करो पार्टी में शामिल हो जाओ।”
फिलहाल पार्टी का कोई औपचारिक संगठनात्मक ढांचा, चुनावी रणनीति या घोषणापत्र सामने नहीं आया है। हालांकि, काटजू ने संकेत दिए हैं कि पार्टी की वेबसाइट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जल्द लॉन्च किए जाएंगे।
पूर्व जज ने खुद को पार्टी का संरक्षक बताया है और कहा है कि इच्छुक लोग ईमेल के माध्यम से उनसे संपर्क कर सकते हैं। इस बीच सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट में उन्होंने वरिष्ठ लेखिका और पत्रकार मृणाल पांडे को भी पार्टी से जुड़ने का निमंत्रण दिया, जिसके बाद इंटरनेट पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई।
कौन हैं मार्कंडेय काटजू?
मार्कंडेय काटजू भारत के पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज रह चुके हैं। वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और 2011 में सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद उन्होंने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया। न्यायपालिका से रिटायर होने के बाद भी वे अपने बेबाक, विवादित और अक्सर वायरल होने वाले बयानों के कारण चर्चा में बने रहे।
मजाक, व्यंग्य या नई राजनीति?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि “इश्क करो पार्टी” सिर्फ एक मजाक या सोशल मीडिया स्टंट नहीं भी हो सकती। कुछ लोगों का मानना है कि यह मौजूदा राजनीतिक माहौल पर एक प्रतीकात्मक टिप्पणी है, जहां प्यार और संवाद की जगह टकराव और ध्रुवीकरण ने ले ली है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या “इश्क करो पार्टी” सोशल मीडिया ट्रेंड बनकर रह जाएगी, या फिर यह वास्तव में युवाओं को जोड़कर एक नए राजनीतिक आंदोलन का रूप ले पाएगी?
आपकी राय क्या है?
क्या “इश्क करो पार्टी” देश की राजनीति में एक नया और सकारात्मक संदेश ला सकती है, या यह सिर्फ सोशल मीडिया पर चर्चा बटोरने की कोशिश है?
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