नहीं रहे निमाड़ की आध्यात्मिक पहचान संत सियाराम बाबा, मोक्षदा एकादशी पर मिला मोक्ष

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निमाड़ की आध्यात्मिक पहचान संत सियाराम बाबा अब नहीं रहे। बुधवार मोक्षदा एकादशी पर सुबह 6.10 मिनट पर उन्हें मोक्ष प्राप्त हो गया। बाबा पिछले 10 दिन से बीमार थे। उनका इलाज चल रहा था। आश्रम में सियाराम बाबा के अंतिम दर्शन को लोगों की भीड़ लगी है।
मध्यप्रदेश के खरगोन जिले की कसरावद तहसील में एक छोटा-सा गाँव है तैली भट्यांण। वैसे तो यह गाँव नर्मदा के तट पर प्राकृतिक सौंदर्य से आह्लादित है किन्तु इस गाँव की प्रसिद्धि देश-विदेश में होने का महत्त्वपूर्ण और एकमात्र कारण हैं संत सियाराम बाबा।
कोई यह नहीं जानता कि बाबा आए कहाँ से और कैसे और क्यों इस गाँव में आए। कुछ 60-70 वर्ष पहले इस गाँव में बाबा आए और तब से लेकर आजतक तैली भट्यांण में ही बाबा ने अपना आश्रम बना लिया। बाबा ने कुटिया बनाई, हनुमान जी की मूर्ति स्थापित की और सुबह-शाम राम नाम का जप और रामचरितमानस का पाठ करते रहते थे बाबा।
कहते हैं बाबा का जन्म मुम्बई, महाराष्ट्र में हुआ, कक्षा 7-8 तक पढ़ाई की, फिर एक गुजराती साहूकार के यहाँ मुनीम का कार्य करने लगे। उसी काम के दौरान एक संन्यासी के दर्शन बाबा को हुए, मन में वैराग्य जागा, राम काज का भाव जागृत हुआ और वे हिमालय पर साधना के लिए चले गए। यह भी कोई नहीं जानता कि सियाराम बाबा के गुरु कौन हैं? कितने वर्ष हिमालय में साधना की? यहाँ तक कि, बाबा के नाम के पीछे की कहानी भी बड़ी मज़ेदार है। कहते हैं कि बाबा ने 12 वर्षों तक मौन धारण करके रखा हुआ था। वहीं, जब 12 वर्ष बाद उन्होंने अपना मुख खोला, तो उनके मुख से पहला शब्द निकला ‘सियाराम’। इस वजह से गाँव के लोगों ने उनका नाम सियाराम रख दिया और अब सियाराम बाबा के नाम से ही पूरे क्षेत्र में वे जाने जाते हैं।
इसके अलावा, बाबा ने 10 वर्षों तक खड़ेश्वर तप भी किया था। यह एक कठिन तप होता है, इसमें तपस्वी को सोने से लेकर दिन भर के सारे काम खड़े रहकर ही करने होते हैं। कहते हैं बाबा के खड़ेश्वर तप के दौरान नर्मदा नदी में बाढ़ आ गई थी और पानी बाबा के नाभि तक आ गया था, लेकिन बाबा अपनी जगह पर ही बने रहे। बाबा टस से मस नहीं हुए, माँ रेवा वहाँ से चली गईं, यह बाबा के तपबल का ही परिणाम है। वैसे खड़ेश्वरी साधना एक तरह का हठयोग है।
भारतीय संत परम्पराओं में हठयोगी साधना में खड़ेश्वरी या खड़ेश्वर तप के नाम से प्रसिद्ध यह साधना बिरले ही कर पाते हैं। बाबा सियाराम की खड़ेश्वरी साधना ने बाबा में अद्भुत ऊर्जा का संचार किया। निराभिमानी बाबा सियाराम नियमित नर्मदा स्नान करते थे और आज भी नर्मदा परिक्रमावासियों की सेवा करते थे। आश्रम में उनके लिए भोजन इत्यादि की व्यवस्था भी रहती है। परिक्रमावासियों के ठहरने के लिए बाबा ने यात्री निवास भी बनवाए हैं। सदाव्रत में बाबा दाल, चावल, तेल, नमक, मिर्च, कपूर, अगरबत्ती व बत्ती भी देते थे। जो भी भक्त आश्रम आता है, बाबा अपने हाथों से चाय बनाकर पिलाते थे। कई बार नर्मदा की बाढ़ की वजह से गाँव के कई घर डूब जाते हैं। यहाँ तक कि, ग्रामीण लोग ऊँची और सुरक्षित जगह चले जाते हैं, लेकिन बाबा अपना आश्रम व मंदिर छोड़कर कहीं नहीं जाते। बाढ़ के दौरान मंदिर में बैठकर रामचरितमानस का पाठ करते हैं। बाढ़ उतरने पर ग्रामवासी उन्हें देखने आते हैं तो बाबा कहते हैं, ‘माँ नर्मदा आई थीं, दर्शन व आशीर्वाद देकर चली गईं। माँ से क्या डरना, वो तो मैया हैं।’
वर्तमान में जहाँ बाबा का आश्रम है, वह डूब में जाने वाला है। मध्यप्रदेश सरकार ने बाबाजी को मुआवज़े के 2 करोड़ 51 लाख दिए थे, दानी बाबा सियाराम ने मुआवज़े की पूरी राशि खरगोन के समीप ही ग्राम नांगलवाड़ी में नाग देवता के मंदिर में दान कर दी ताकि वहाँ भव्य मंदिर बन सके और भक्तों को सुविधा मिले। यहाँ तक कि श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या में मन्दिर निर्माण में भी बाबा ने ढाई लाख रुपए दान किए।
बाबा के आश्रम का नियम है कि वहाँ केवल 10 रुपए ही दान में स्वीकार किए जाते हैं और दानदाता का नाम रजिस्टर में बाबा दर्ज करते हैं। उन पैसों से नर्मदा परिक्रमावासियों का खाना और रहने की व्यवस्था वर्षों से आश्रम में होती आ रही है। वैसे तो निमाड़ की रत्नगर्भा धरती पर संत सियाराम बाबा का होना ही चमत्कार है। प्रतिदिन 15 घण्टे से अधिक समय तक बाबा रामचरित मानस का पाठ करते हैं। लाखों भक्तों की आस्था के केंद्र तैली भट्यांण में विशेषकर गुरु पूर्णिमा एवं सामान्य दिनों में भी बाबा का पूजन करने बड़ी संख्या में उनके भक्त आते हैं। बाबा की उम्र को लेकर भी कई बातें प्रचलित हैं, कोई 116 वर्ष बताता है तो कोई 130 वर्ष किन्तु प्राप्त जानकारियों के अनुसार 109 वर्ष की आयु थी बाबा की। महादानी, निराभिमानी संत हज़ारों वर्षों में एक बार जन्म लेते हैं। परम प्रतापी संत जीवन भर जो एक लंगोट में रहते हैं, ठंड हो, गर्मी हो चाहे बरसात हो, लाखों-करोड़ों देशी-विदेशी भक्तों की आस्था के केन्द्र संत सियाराम बाबा अपना कार्य स्वयं करते थे।

Ardhendu Bhushan
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Ardhendhu Bhushan is a senior consulting editor with extensive experience in the media industry. He is recognized for his sharp editorial insight and strategic guidance.

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