मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का फैसला आपसी सहमति से तलाक में छह माह इंतजार जरूरी नहीं होने से जुड़ा है। इंदौर खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत सहमति से तलाक के मामलों में छह महीने की अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि (कूलिंग पीरियड) हर बार लागू नहीं होती।
इंदौर हाई कोर्ट ने छह महीने की प्रतीक्षा अवधि को अनिवार्य नहीं माना
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला 6 अक्टूबर 2026 को सुनाया। अदालत ने कहा कि यदि पति-पत्नी लंबे समय से अलग रह रहे हैं और उनके बीच सुलह की कोई गुंजाइश नहीं बची है, तब अदालत छह माह के कूलिंग पीरियड को माफ कर सकती है। यह आदेश जस्टिस संदीप एन. भट्ट की एकल पीठ द्वारा दिया गया।
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फैमिली कोर्ट के आदेश को हाई कोर्ट ने किया रद्द
इससे पहले इंदौर के कुटुंब न्यायालय ने छह महीने की प्रतीक्षा अवधि में छूट देने से इनकार कर दिया था और अगली सुनवाई के लिए 4 अप्रैल 2027 की तारीख निर्धारित की थी। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस आदेश को अनुचित मानते हुए उसे निरस्त कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि कुटुंब न्यायालय को आदेश की प्रति मिलने के 15 दिनों के भीतर पुनर्विचार कर फैसला लेना होगा।
धारा 13-बी के तहत सहमति से तलाक में प्रतीक्षा अवधि का महत्व
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए छह महीने की प्रतीक्षा अवधि का प्रावधान है, जिसे कूलिंग पीरियड भी कहा जाता है। इसका उद्देश्य दंपती को पुनः विचार करने और सुलह का मौका देने का होता है। लेकिन हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अवधि अनिवार्य नहीं बल्कि निर्देशात्मक है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का संदर्भ देते हुए हाई कोर्ट का निर्णय
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले, जैसे कि अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर (2017), को भी संदर्भित किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि छह महीने की अवधि निर्देशात्मक है, अनिवार्य नहीं। इसी आधार पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कूलिंग पीरियड में छूट देने का अधिकार कुटुंब न्यायालय को दिया।
आम लोगों के लिए फैसले का प्रभाव
इस फैसले से आम लोगों के लिए तलाक की प्रक्रिया आसान हो सकती है। वे लंबे इंतजार के बिना आपसी सहमति से तलाक पा सकते हैं, खासकर जब दंपती पहले से ही अलग रह रहे हों और सुलह की संभावना खत्म हो चुकी हो। इससे वैवाहिक विवादों का शीघ्र समाधान संभव होगा।
आगे की प्रक्रिया और न्यायालयों के लिए निर्देश
हाई कोर्ट ने कुटुंब न्यायालयों को इस फैसले के बाद निर्देश दिया है कि वे ऐसे मामलों में छह महीने के कूलिंग पीरियड को सख्ती से लागू न करें और परिस्थितियों के अनुसार छूट प्रदान करें। इससे पारिवारिक विवादों के शीघ्र निपटारे को बढ़ावा मिलेगा।



