सागर। सागर के बंडा क्षेत्र में जहरीली शराब से मौतों के बाद सामने आया ललितपुर कनेक्शन अब प्रशासनिक व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। पुलिस की जांच में सागर तक पहुंच रही नकली शराब के तार उत्तर प्रदेश के ललितपुर से जुड़ रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस अवैध शराब नेटवर्क का सुराग मई में ही पुलिस को मिल गया था और एफआईआर भी दर्ज हो चुकी थी, उसी नेटवर्क की कड़ियां कुछ महीने बाद सागर में हुई मौतों से जोड़ी जा रही हैं।
सवाल यह है कि मई में जब पुलिस को अवैध शराब के इस नेटवर्क की जानकारी मिल गई थी, तब मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा पर निगरानी क्यों नहीं बढ़ाई गई? अगर ललितपुर से सागर के सीमावर्ती गांवों तक शराब पहुंच रही थी तो रास्ते में पुलिस और आबकारी विभाग की नजर क्यों नहीं पड़ी? और अगर नजर पड़ी थी तो कार्रवाई कहां हुई?
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मई में एफआईआर, फिर भी नहीं टूटी सप्लाई चेन
ललितपुर पुलिस में मई 2026 में अवैध शराब की सप्लाई को लेकर एफआईआर दर्ज होने की बात सामने आई है। मामले में 12 आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की जानकारी है। जांच के दौरान रवि लखेरा, उसकी पत्नी शिवानी लखेरा, चंद्रेश लोधी और मोना राजा सहित कुछ लोगों के नाम सामने आए हैं। पुलिस के मुताबिक आरोपियों पर नकली शराब तैयार करने और उसे दूसरे इलाकों में सप्लाई करने के आरोप हैं। शराब की बोतलों पर नकली रैपर और ढक्कन लगाकर उसे असली ब्रांड जैसा दिखाने की बात भी सामने आई है। यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर मई में नेटवर्क सामने आ गया था तो सितंबर तक इसकी सप्लाई चेन कैसे चलती रही? क्या दोनों राज्यों की पुलिस और आबकारी विभाग के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान नहीं हुआ? क्या ललितपुर में सामने आए नेटवर्क की जानकारी सागर पुलिस और आबकारी विभाग तक नहीं पहुंची? यदि पहुंची थी तो सीमावर्ती गांवों में निगरानी के लिए क्या कदम उठाए गए?
शराब माफिया के लिए कोई सीमा रेखा नहीं
ललितपुर से सागर के गांवों तक शराब पहुंचने की बात सामने आने के बाद सीमा निगरानी की व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा होता है। प्रारंभिक जांच में बांदरी, बढ़ोदिया, गूगरा खुर्द, नौराज और बैराज सहित कई गांवों तक सप्लाई पहुंचने के संकेत मिले हैं। बताया जा रहा है कि शराब को कार और बाइक के जरिए सीमा पार पहुंचाया जाता था। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर कार-बाइक से लगातार शराब की खेप आती रही और जिम्मेदार विभागों को भनक तक नहीं लगी? यदि सामान्य पुलिस गश्त और आबकारी निगरानी इतनी कमजोर है कि नकली शराब की खेप एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंचकर कई गांवों में बिक जाए, तो फिर सीमा क्षेत्रों में चल रही निगरानी व्यवस्था का औचित्य क्या है?
असली-नकली नहीं पहचान पाया सिस्टम
इस मामले का सबसे चिंताजनक पहलू नकली शराब की पैकिंग है। आरोप है कि शराब को असली ब्रांड जैसा दिखाने के लिए नकली रैपर और ढक्कन लगाए जाते थे। अवैध कारोबारियों ने बाजार की मांग, ब्रांड की पैकिंग और ग्राहकों की मनोवृत्ति को समझकर पूरा सिस्टम तैयार कर लिया, लेकिन सरकारी निगरानी तंत्र इस फर्जीवाड़े को पकड़ने में पीछे रह गया। यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि शराब की दुकानों और उसके आसपास बिकने वाली बोतलों की नियमित जांच कितनी गंभीरता से होती है? क्या नमूने लिए जाते हैं? क्या बोतलों के बैच, पैकिंग और स्रोत की जांच होती है? या फिर आबकारी कार्रवाई सिर्फ अवैध शराब की छोटी-मोटी जब्ती तक सीमित है?
मौतों के बाद जागा सिस्टम
सागर में मौतों के बाद शराब दुकानों और अवैध शराब के ठिकानों की जांच तेज होने की बात सामने आ रही है। कार्रवाई और सीलिंग शुरू हो गई है। यह कार्रवाई अपने आप में एक और सवाल पैदा करती है—क्या प्रशासन को हर बार मौतों के बाद ही सक्रिय होना है? अवैध शराब बिकने की शिकायतों पर पहले कार्रवाई क्यों नहीं होती? जिन गांवों में लंबे समय से सस्ती शराब उपलब्ध थी, वहां पुलिस और आबकारी विभाग की नियमित निगरानी क्यों नहीं थी? स्थानीय स्तर पर शराब पहुंचाने और बेचने वालों की पहचान पहले क्यों नहीं की गई? अगर मौतों के बाद कुछ ही घंटों में संदिग्ध ठिकाने चिन्हित हो सकते हैं और कार्रवाई शुरू हो सकती है, तो यही काम पहले क्यों नहीं किया गया?
शराब माफिया के साथ निगरानी तंत्र भी जिम्मेदार
जहरीली शराब से मौतों के मामले में दोषियों पर कठोर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन जांच का दायरा केवल शराब बनाने और बेचने वालों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जिस इलाके में महीनों तक अवैध शराब बिकती रही, वहां जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। किस अधिकारी के क्षेत्र में शराब की सप्लाई हो रही थी? कितनी बार छापे पड़े? कितने नमूने लिए गए? कितनी अवैध शराब पकड़ी गई? मई की ललितपुर एफआईआर की सूचना सागर के अधिकारियों को कब मिली? सूचना मिलने के बाद क्या कार्रवाई की गई? सीमा से लगे इलाकों में कितनी चेकिंग हुई?



