चुनाव आयोग में विवाद के बीच, दो चुनाव आयुक्तों की सहमति बिना लिए गए SIR फैसले पर याचिका दायर की गई है। यह विवाद मतदाता सूचियों के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर उत्पन्न हुआ है, जिसमें दो आयुक्तों ने कई फैसलों पर लिखित आपत्तियां जताई हैं।
दो चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियां और मुख्य चुनाव आयुक्त पर आरोप
सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में मतदाता सूचियों के संशोधन से जुड़ी SIR प्रक्रिया पर कम से कम 14 बार अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की अगुवाई में कई प्रशासनिक आदेश बिना उनकी सहमति के जारी किए गए। इन आदेशों में मतदाता पंजीकरण के लिए फॉर्म-6 में बदलाव और मतदाता सूची के डेटाबेस तक अधिकारियों की पहुंच को लेकर भी सवाल उठाए गए।
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सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका
एडवोकेट शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। इसमें मांग की गई है कि बिना बहुमत या सर्वसम्मति के CEC ज्ञानेश कुमार द्वारा लिए गए फैसलों को असंवैधानिक घोषित किया जाए। साथ ही, SIR प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से नाम हटाने की जांच के लिए एसआईटी गठित करने और रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट, 1950 की धारा 32 के तहत कार्रवाई की भी मांग की गई है।
बॉम्बे हाईकोर्ट में महाराष्ट्र में SIR प्रक्रिया पर रोक की याचिका
महाराष्ट्र के नागरिकों ने बॉम्बे हाईकोर्ट की कोल्हापुर बेंच में याचिका दायर कर राज्य में जारी SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की है। इसके साथ ही, उन्होंने आगामी विधानसभा चुनाव टालने और हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने की भी अपील की है। याचिका में आयोग के 14 प्रशासनिक आदेशों को रद्द करने की मांग भी शामिल है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की मांग
एडवोकेट ब्रजेश सिंह ने भारत के अटॉर्नी जनरल को पत्र लिखकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए सहमति देने का अनुरोध किया है। यह कदम आयोग में चल रहे विवाद को और बढ़ा सकता है।
चुनाव आयोग का विवाद पर स्पष्टीकरण
विवाद बढ़ने पर चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। आयोग ने बताया कि विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और सुझाव सामान्य हैं। उन्होंने यह भी कहा कि SIR प्रक्रिया में नए मतदाताओं के लिए घोषणापत्र अनिवार्य किया गया है, जो रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट से मेल खाता है।
मतदाता सूची विवाद का आम आदमी पर असर और आगे की संभावना
इस विवाद का असर आम जनता पर भी पड़ सकता है, खासकर आगामी चुनावों में। मतदाता सूची में संशोधन विवादित होने से चुनाव प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में याचिकाओं के नतीजे पर आयोग के फैसलों की वैधता तय होगी। राजनीतिक दल इस मुद्दे को लेकर सक्रिय हैं और आगे भी इस विवाद के राजनीतिक और कानूनी पहलुओं पर बहस जारी रहने की संभावना है।



