पश्चिम बंगाल में वर्षों से भाजपा ने अपनी सरकार बनने का सपना देखा। दो चुनाव में सफलता नहीं मिली तो तीसरे चुनाव में पूरी ताकत लगा दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह से लेकर भाजपा के कई दिग्गजों ने विधानसभा चुनाव में बंगाल में डेरा डाला। दीदी यानी ममता बनर्जी पर हर तरह के हथकंडे अपनाए गए, परिणामस्वरूप जनता ने भाजपा को जिता दिया या भाजपा वहां जीत गई।
पूरे चुनाव में पीएम मोदी और गृह मंत्री शाह ने चिल्ला-चिल्ला कर टीएमसी की गुंडागर्दी को टारगेट किया। अल्पसंख्यकों का मुद्दा उठाया। कटमनी की बात की। टीएमसी की गुंडागर्दी के कारण मृत भाजपा कार्यकर्ताओं को याद किया और उनके परिवारों से मिलकर माहौल भी बनाया।
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जनता को लगा कि भाजपा ठीक कह रही है। जब पीएम मोदी और गृह मंत्री शाह कह रहे हैं कि गुंडागर्दी से मुक्ति दिला देंगे तो सही ही कह रहे। परिणाम आए और कभी ममता बनर्जी और टीएमसी के खास रहे सुवेंदु अधिकारी को सीएम की कमान मिली। जनता ने भी खूब ढोल बजाए, जयश्रीराम के नारे के साथ फूल उड़ाए।
कुछ ही दिन बाद फिर वही सब शुरू हो गया। जगह-जगह मारकाट मचने लगी। पहले भाजपा के दफ्तर और नेता-कार्यकर्ता निशाने पर रहते थे, अब टीएमसी टारगेट पर है। टीएमसी के दफ्तर तोड़े जा रहे हैं, उनके कार्यकर्ताओं को मारा-पीटा जा रहा है। और तो और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के साथ भी मारपीट हो जा रही है। सरकारी एजेंसियों के छापे, नोटिस और जांच तक तो सही है, लेकिन एक विरोधी पार्टी के नेता पर इस तरह के हमले क्या शोभा देते हैं?
बंगाल की विडंबना है कि वह उसे कभी गुंडागर्दी से मुक्ति नहीं मिली। ममता बनर्जी ने कम्युनिस्ट पार्टियों की गुंडागर्दी से मुक्ति दिलाने का नाम लेकर सत्ता हासिल की। फिर खुद ही उनकी पार्टी गुंडागर्दी में कम्युनिस्टों से भी आगे निकल गई। अब भाजपा भी टीएमसी की गुंडागर्दी से मुक्ति का नारा देकर सत्ता में आई है और वह भी टीएमसी की राह पर चल पड़ी है।
बंगाल की जनता सोच रही है…सिर्फ झंडे का रंग बदला है…चेहरे भी वही हैं और उनकी सोच भी वही…
क्या एक बार फिर बंगाल की जनता के साथ खेला हो गया…



