बिहार में 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके नीतीश कुमार का अचानक राज्यसभा जाना किसी को समझ नहीं आ रहा। जो व्यक्ति सीएम की कुर्सी पर बैठने के लिए कभी राजद कभी भाजपा का दामन थामता रहा, उसने अचानक यह फैसला क्यों ले लिया?
बिहार के सियासी गलियारे में चर्चा है कि नीतीश कुमार ने अपने बेटे निशांत कुमार के भविष्य के लिए ऐसा फैसला लिया। उन्हें पता था कि भाजपा उन्हें इस कुर्सी पर बैठे देखना नहीं चाह रही, इसीलिए सोचा कि कम से कम समय से पहले रिटायरमेंट लेकर बेटे की ‘नौकरी’ लगवा दें।
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आपको पटना में नीट छात्रा की मौत का मामला याद होगा। इस मामले में कहा गया था कि छात्रा के साथ रेप भी हुआ था। तब पूर्व आईपीएस अफसर अमिताभ दास ने इस मामले में नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार का नाम लिया था। उन्होंने कहा था कि सीएम नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार का डीएनए टेस्ट करवाया जाना चाहिए। इसके बाद अमिताभ दास की गिरफ्तारी भी हुई थी।
बिहार के सियासी गलियारे में चर्चा है कि नीतीश कुमार को यह लगने लगा था कि अब भी वे कुर्सी की जिद में अड़े रहे तो उनके दामन पर दाग लगना तय है। नीतीश कुमार को समझने वाले लोग यह जानते हैं कि वे कुछ भी कर देंगे, लेकिन अपने दामन पर दाग नहीं लगने देंगे।
पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जदयू के काफी कम सीट जीतने के बाद भी नीतीश कुमार को सीएम बना दिया था। इस बार भी ऐसा ही हुआ, लेकिन शायद तभी नीतीश कुमार को समझा दिया गया था कि सम्मान के लिए ऐसा कर दिया गया है, आगे ऐसा नहीं चलेगा। भाजपा ने इस बार नीतीश कुमार की पार्टी के कुछ सांसदों को भी तोड़ना शुरू कर दिया था।
शायद नीतीश कुमार को भाजपा का फॉर्मूला समझ आ गया था। उन्हें यह भान था कि अगर अपनी जिद पर अड़े रहे तो कभी भी तख्तापलट हो सकता है। इस बार सरकार के गठन में भी नीतीश की नहीं चली और भाजपा ने गृह मंत्री का पद भी ले लिया था ।
इधर, नीतीश कुमार को अपने बेटे भविष्य की चिन्ता भी सता रही थी। वर्तमान सौदेबाजी में बेटा डिप्टी सीएम तो बन ही जाएगा।
खैर, नीतीश कुमार का यह फैसला भारतीय राजनीति में लंबे समय तक याद रखा जाएगा।
भले ही पुत्र मोह हो या दामन पर दाग का डर, सुशासन बाबू ने एक बार फिर पलटा मार कर सबको चौंका दिया।


