माओवादियों का शहीद स्मृति सप्ताह घोषित, एक वर्ष में 357 सदस्य मारे जाने की स्वीकारोक्ति

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माओवादियों का शहीद स्मृति सप्ताह घोषित, एक वर्ष में 357 सदस्य मारे जाने की स्वीकारोक्ति

माओवादी संगठन ने 28 जुलाई से 3 अगस्त तक शहीद स्मृति सप्ताह मनाने की घोषणा की है। इस अवसर पर जारी एक बयान में संगठन ने स्वीकार किया है कि पिछले एक वर्ष में उनके 357 सदस्य मारे गए, जिनमें केंद्रीय समिति के चार, राज्य समिति के 16 सदस्य और कई महिला कार्यकर्ता शामिल हैं। संगठन ने बताया कि अधिकांश माओवादी सुरक्षा बलों के अभियानों में मारे गए हैं।

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गुरिल्ला रणनीति में चूक और जनाधार में गिरावट की स्वीकारोक्ति

संगठन ने बयान में यह भी माना है कि गुरिल्ला युद्ध की मूल रणनीति को ठीक से लागू नहीं किया गया, जिससे माओवादियों की ताकत कमजोर और असंगठित हो गई। इसके परिणामस्वरूप उनका जनाधार भी सिमट रहा है और संगठन के भीतर आत्ममंथन की स्थिति बन गई है। बावजूद इसके, माओवादी अब भी हिंसा को तेज करने की बात कर रहे हैं, जो दर्शाता है कि वे अब भी लोकतांत्रिक व्यवस्था और संविधान के विरोध में खड़े हैं।

18 महीनों में 450 माओवादी ढेर, 1,400 ने किया समर्पण

पिछले 18 महीनों में हुई मुठभेड़ों में सुरक्षा बलों ने करीब 450 माओवादियों के शव बरामद किए हैं, जबकि लगभग 1,400 माओवादियों ने समर्पण कर दिया है। यह आंकड़े बताते हैं कि माओवादी संगठन की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है।

बीजापुर में माओवादियों द्वारा दो शिक्षादूतों की हत्या

छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में माओवादियों ने दो शिक्षादूतों सुरेश मेट्टा और विनोद मडे की हत्या कर दी। दोनों पर पुलिस मुखबिरी का आरोप लगाया गया था। माओवादियों ने सोमवार रात उनका अपहरण किया और मंगलवार सुबह उनके शव मिले। दोनों शिक्षादूत 2019 से भोपालपटनम ब्लॉक में सेवा दे रहे थे।

शिक्षादूत संघ के जिलाध्यक्ष सुरेश कोरम के अनुसार, अब तक बीजापुर में 5 और सुकमा में 2 शिक्षादूत माओवादियों के हाथों मारे जा चुके हैं।

माओवादियों की अन्य हिंसात्मक गतिविधियाँ

माओवादियों ने नारायणपुर जिले के मडोनार गांव में एक मोबाइल टावर में आग भी लगा दी। इस घटना के बाद जिला पुलिस बल और आईटीबीपी ने संयुक्त तलाशी अभियान शुरू किया है।

इन घटनाओं से साफ है कि माओवादी संगठन एक ओर जहां आंतरिक संकट और संघर्ष का सामना कर रहा है, वहीं दूसरी ओर हिंसक गतिविधियों को तेज करने की जिद पर अब भी अड़ा हुआ है।

Abhilash Shukla (Editor)
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