इंदौर। डेली कॉलेज सोसायटी के संविधान संशोधन, चुनाव प्रक्रिया तथा बोर्ड ऑफ गवर्नर्स से जुड़े मामलों को चुनौती देने के लिए दायर याचिकाओं को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने आज खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट की एकलपीठ ने विस्तृत सुनवाई के बाद स्पष्ट रूप से कहा कि जब चुनाव प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी हो, बैलेट पेपर्स जारी हो चुके हों और चुनाव की तारीख घोषित हो चुकी हो, तब इस स्तर पर न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करेगा।
चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने का दिया हवाला
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इन रिट याचिकाओं में, सभी मुद्दे आपस में जुड़े हुए हैं और अब चुनाव की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है। चुनाव कार्यक्रम पहले ही प्रकाशित हो चुका है, उसके बाद मतपत्र भी संबंधित पक्षों को भेजे जा चुके हैं और चुनाव 21 मई 2026 को होने जा रहे हैं; इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं के लिए रजिस्ट्रार के समक्ष वैकल्पिक उपाय का लाभ उठाकर अपनी सभी दलीलें रखने का अवसर उपलब्ध है, जिसमें संविधान में संशोधन से संबंधित शिकायत भी शामिल है।
👉 यह भी पढ़ें:
- कर्मचारीगण गृह निर्माण संस्था की वरीयता सूची पर रोक, हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार को सूची जांच कर जमा कराने के दिए आदेश
- Raisen-Bhopal National Highway पर बड़ा हादसा, दो बसों की टक्कर में पांच की मौत, 35 यात्री घायल
- राज्यसभा के लिए कमलनाथ सहित अन्य नेताओं की नहीं गली दाल, मध्यप्रदेश से राहुल गांधी की पसंद मीनाक्षी नटराजन को मिला मौका
- राज्यसभा चुनाव में एक बार फिर चली दिल्ली की मर्जी, घुंघरू बांधे बैठे रह गए भाजपा के कई नेता
कोर्ट ने कहा-वैकल्पिक उपाय ही उचित
याचिकाकर्ता के लिए कानून के अनुसार वैकल्पिक उपाय का लाभ उठाना भी खुला है। मुझे इस बात की जानकारी है कि कोई पूर्ण रोक नहीं है और किसी विशेष मामले में, याचिका पर विचार किया जा सकता है, भले ही वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हो; लेकिन वर्तमान याचिकाकर्ता के ‘लोकस’ (याचिका दायर करने के अधिकार) से संबंधित मुद्दे पर विचार करते हुए, और इस तथ्य पर विचार करते हुए कि प्रतिवादी संख्या 4 एक निजी, गैर-सहायता प्राप्त संस्था है—साथ ही इस तथ्य को भी ध्यान में रखते हुए कि धारा 40 के तहत अपील के रूप में एक वैकल्पिक उपाय मौजूद है—और इस पहलू पर विचार करते हुए कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत इस न्यायालय का अधिकार क्षेत्र उन मामलों में बहुत सीमित है जहाँ चुनाव प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है। याचिकाकर्ता के वकील द्वारा की गई इस दलील पर कोई विवाद नहीं है कि अनुच्छेद 19(1)(c) भी महत्वपूर्ण है, लेकिन जब तथ्यों से संबंधित कुछ प्रश्नों पर भी विचार किया जाना आवश्यक हो, तो याचिकाकर्ता के लिए कानून के अनुसार उपलब्ध वैधानिक उपाय का लाभ उठाना ही उचित है। इसलिए, मेरा यह मत है कि प्रतिवादी संख्या 4 द्वारा उठाई गई प्रारंभिक आपत्तियों में दम है और इसलिए, वर्तमान याचिकाओं पर विचार किया जाना आवश्यक नहीं है। तदनुसार सभी रिट याचिकाएं खारिज की जाती हैं।
हाईकोर्ट ने अन्य फैसलों का दिया हवाला
कोर्ट ने कहा कि हमें सूचित किया गया है कि मद्रास उच्च न्यायालय के अतिरिक्त, सात अन्य राज्यों के उच्च न्यायालयों ने यह निर्णय दिया है कि नामांकन पत्रों की अनुचित अस्वीकृति से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई करने का अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) उन्हें संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत प्राप्त नहीं है। मेरी राय में, यह दृष्टिकोण पूर्णतः सही है और इसकी पुष्टि की जानी चाहिए। अतः, यह अपील असफल मानी जाएगी और इसे खारिज किया जाता है। इस अपील में उठाए गए बिंदुओं की प्रकृति और उनके महत्व को देखते हुए, लागत (costs) के संबंध में कोई आदेश पारित नहीं किया जाता है।


