कर्मचारीगण गृह निर्माण संस्था में अब आईडीए के अधिकारियों ने जमाया खेल, कोर्ट की आड़ में विवादित वरीयता सूची पर ही निकलवा दी डिमांड

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इंदौर। कर्मचारीगण गृह निर्माण संस्था में फर्जीवाड़ा अभी भी थमने का नाम नहीं ले रहा। संस्था की जिस वरीयता सूची को लेकर विवाद चल रहा है, आईडीए अधिकारियों ने मिलीभगत से उस पर ही डिमांड निकलवा दी है। कोर्ट की आड़ में आईडीए के विधि एवं भू अर्जन अधिकारी सुदीप मीणा ने पूरा खेल जमाया है।

आईडीए सीईओ ने कर्मचारीगण गृह निर्माण संस्था के अध्यक्ष आरडी शेगांवकर को 5 मार्च 25 को एक पत्र लिखा है। इसमें कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए कहा गया है कि प्राधिकरण द्वारा पत्र कमांक 4539 दिनांक 3 दिसंबर 2020 से माह नवम्बर, 2020 की स्थिति में संस्था को राशि 3,57,21,909 रुपए की डिमाड जारी की गई थी, किन्तु संयुक्त आयुक्त, सहकारिता द्वारा संस्था की वरीयता सूची नहीं देने से संस्था द्वारा दी गई राशि वापस कर दी गई थी। अब संयुक्त आयुक्त, सहकारिता, इन्दौर द्वारा वरीयता सूची प्राधिकारी को भेजी गई है। अत: मार्च-2026 की स्थिति में देय राशि 8,22,36,836 रुपए प्राधिकारी कोष में जमा करा दें। इस पत्र में सूची सत्यापन के लिए कुछ स्पष्टीकरण भी मांगा गया है।

डीआर ने अपने स्तर पर फाइनल कर दी थी सूची

उल्लेखनीय है कि उपायुक्त ने वर्षों से विवादित कर्मचारीगण गृह निर्माण संस्था की वरीयता सूची अपने स्तर पर फाइनल कर हाईकोर्ट में लगा दी थी। यह सूची हाईकोर्ट ने आईडीए को भेज दी। इसको लेकर सहकारिता आयुक्त से डीआर को शिकायत की गई है। डीआर ने सूची फाइनल कर कोर्ट को तो दे दी, लेकिन यह नहीं बताया कि इसको लेकर कितने केस पेंडिंग है। उपायुक्त ने ईओडब्ल्यू की जांच तक को छुपा लिया।

पैसों के दम पर चल रहा था पूरा खेल

सूत्र बताते हैं कि इसी संस्था के उप अंकेक्षक रह चुके आनंद पाठक ने भूमाफियाओं के साथ मिलकर यह सारा खेल जमाया है। इसकी फीस के तौर पर पाठक ने 10 प्लॉट संस्था से मांगे हैं। पाठक के कहने पर ही डीआर ने पूरा खेल जमाया है। यही वजह है कि वरिष्ठ अधिकारियों की आपत्ति के बाद भी सूची फाइनल कर दी गई है। इतना ही नहीं पाठक ने हर संबंधित विभाग के अधिकारियों के नाम पर सदस्यों से प्रति प्लॉट 20-20 लाख रुपए की वसूली भी की है। बताया जाता है कि पाठक ने ही वरीयता सूची के लिए पूर्व डीआर को 40 लाख रुपए दिए थे। अब वर्तमान सहकारिता निरीक्षक संजय कूचनकर को 20 लाख रुपए दिए। संजय कूचनकर ने पुराने डीआर की बनाई सूची में छेड़छाड़ नहीं करने के एवज में वर्तमान डीआर को 12 लाख रुपए दिए।

सहकारिता आयुक्त को भी भ्रम में रखने की कोशिश

संस्था के सदस्य बालेश चौरसिया ने आयुक्त सहकारिता से डीआर की शिकायत की थी। इसमें हाईकोर्ट के एक आदेश तथा अन्य प्रकरणों का हवाला देते हुए कहा गया है कि संस्था द्वारा प्रेषित वरीयता सूची के आधार पर प्लॉटों का आवंटन नहीं करें। चौरसिया ने इस सूची को अवैधानिक बताया है। शिकायत में इस संबंध में चल रहे सारे प्रकरणों का हवाला देते हुए कहा कि इसके बाद भी उपायुक्त महोदय ने अपने अधीनस्थ अधिकारियों से मिलीभगत कर सूची आईडीए को भेज दी है।

संयुक्त आयुक्त ने भी उठाई थी आपत्ति

संयुक्त आयुक्त सहकारिता बीएल मकवाना के पत्र को भी अनदेखा कर दिया। भूमाफियाओं से मिलीभगत कर उपायुक्त ने कोर्ट के बहाने अब गेंद इंदौर विकास प्राधिकरण के पाले में डाल दी है। उल्लेखनीय है कि संयुक्त सहकारिता बीएल मकवाना ने कर्मचारीगण गृह निर्माण सहकारी संस्था की वरीयता सूची को लेकर उपायुक्त को 10 अक्टूबर 25 को एक पत्र भेजा था। इसमें उपायुक्त के 17 जून 25 के भेजे पत्र का हवाला दिया गया था। मकवाना ने अपने पत्र में संस्था के ऑडिट और सदस्यों की संख्या को लेकर आपत्ति उठाई थी। इसके बाद उन्होंने उपायुक्त को सूची वापस कर दी थी। उपायुक्त ने इसका जवाब 4 नवंबर 25 को संयुक्त आयुक्त को भेजा। बताया जाता है कि उपायुक्त यह सारी कवायद हाईकोर्ट से छुपा गए और वरीयता सूची भेज दी।

ईओडब्ल्यू पहले से ही कर रहा जांच

इस मामले में आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ इकाई (ईओडब्ल्यू) में प्रकरण पंजीबद्ध है। ईओडब्ल्यू ने 23 सितंबर 25 को ही सुरेंद्र जैन सहकारी निरीक्षक इंदौर, एनके राठौर सेवानृवित्त वरिष्ठ सहकारी निरीक्षक इंदौर, बीएल मकवाना, संयुक्त आयुक्त सहकारिता, इंदौर, राधेश्याम गरोठिया सहकारी निरीक्षक इंदौर सहित संस्था के सदस्यों को नोटिस जारी किया था। ईओडब्ल्यू ने आईडीए सीईओ को इस संबंध में 21 नवंबर को एक पत्र भेजकर इस केस की पूरी जानकारी मांगी थी। अब इस मामले में सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग ने भी जांच के आदेश दिए हैं।

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