फिल्म समीक्षा : बॉर्डर-2 में देशप्रेम के साथ मनोरंजन का भी तड़का

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डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार

फ़िल्म के तीन दृश्य :

मां 1 : बेटा युद्ध के लिए जा रहा है। मां से कहता है – मुझे आशीर्वाद दो कि दुश्मनों को मार करके ही वापस आऊं। मां कहती है – बेटा तुम्हारे दुश्मनों की भी तो कोई मां होगी। वे भी अपनी मां से लम्बी उमर का आशीर्वाद लेकर आये होंगे।
मां 2 : युद्ध में शहीद हुए फौजी युवा की मां अपने फौजी पति से कह रही है – मैं कभी नहीं चाहती थी कि मेरा बेटा भी तुम्हारी तरह फौज में जाए, लेकिन जिस दिन मैंने उसे फौज की वर्दी पहने शपथ लेते हुए देखा – मुझे उस पर बड़ा फ़ख़्र हुआ।
मां 3 : बेटा जंग में जा रहा है। मां कहती है – जाओ, दोनों जंग जीतकर आओ. एक यह जंग और दूसरी जो तुम्हारे भीतर चल रही है।
बॉर्डर 2 को एक्शन वार फिल्म बताया गया है लेकिन वास्तव में यह फौजियों के परिवारों की कहानी, उनकी ज़िंदगी, उनकी चिंताएं और सरोकार पूरी संजीदगी से बताती है।
फिल्म कहती है कि पूरा देश फौजियों का परिवार है। इस आधार पर तो पूरे देश के लोगों को फौजियों के परिवारों की चिंता होनी चाहिए, लेकिन ऐसा है नहीं। फिल्म इसकी और इशारा करती है।
बॉर्डर 2 पैट्रियॉटिक वॉर ड्रामा है, जो 1997 की क्लासिक बॉर्डर की स्पिरिचुअल सीक्वल/स्टैंडअलोन स्टोरी है। यह 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध को बैकग्राउंड में रखकर जमीन, समंदर और आसमान में फैली कहानी बताती है। यह ओरिजिनल बॉर्डर जितनी क्लासिक या इम्पैक्टफुल नहीं बन पाई। बॉर्डर का संगीत दिल को ज़्यादा छू लेनेवाला था और युद्ध के सीन वास्तविकता के काफी करीब थे। उसमें कई दृष्यों की शूटिंग के लिए असली टैंकों का उपयोग किया गया था और गोला बारूद से विस्फोट किए गए थे।
शुरुआत में जब टाइटल आते हैं तब सनी देओल के नाम के नीचे ब्रैकेट में लिखा होता है – धर्मेंद्र जी के बेटे! लेकिन जब अहान शेट्टी का नाम आता है तब नीचे नहीं लिखा होता – सुनील शेट्टी के बेटे और ना ही वरुण धवन के नाम के नीचे लिखा होता है – डेविड (राजेंदर) धवन के बेटे।
वार फिल्में बनाना आसान नहीं है। भारतीय सेना की मदद के बिना ना तो बॉर्डर बन सकती थी ना बॉर्डर 2.
युद्ध की भारतीय फिल्मों में कुछ खास तरह के टेंपलेट्स चलते हैं – रिक्त स्थान की पूर्ति कर दी जाती है। फौजियों की ट्रेनिंग में आपसी प्रतिस्पर्धा रहती है, उनकी फिजिकल ट्रेनिंग को तो बहुत रूटिंग तरीके से दिखाया जाता है लेकिन उन्हें मिलने वाली मेंटल ट्रेनिंग के बारे में कभी ध्यान नहीं दिया जाता।
सैनिकों के परिवारों के कुछ खास टेंप्लेटस हैं…घर में बहन होगी जिसकी शादी करनी है…बूढ़ा बाप होगा जिसके जीवन का सहारा बेटा है… मां होगी जो बेटे के लिए टसुए बहाती रहती है।
असल में फौजियों की जिंदगी फिल्मी फ़ौजियों से कहीं ज्यादा कठिन, रोमांचक और चुनौतीपूर्ण होती है। महू के आर्मी वॉर कॉलेज, एमसीटीई (मिलिट्री कॉलेज ऑफ़ टेली कम्युनिकेशन्स एंड इंजिनियरिंग), इन्फेंट्री स्कूल आदि में झलक दिख जाती है। फौजियों के परिवारों की महिलाएं साइंटिस्ट, डिजाइनर, फ़िल्म मेकर, मीडिया हस्तियां, समाजशास्त्री, मिस यूनिवर्स तक हैं। वे गुरबानी का पाठ भी करती हैं और कई क्षेत्रों में देश का नेतृत्व भी।
बॉर्डर 2 ने देशप्रेम के साथ ही मनोरंजन का दामन भी पकड़े रखा है। फिल्म के फर्स्ट हाफ में किरदारों को स्थापित किया वह भी मनोरंजक अंदाज में और सेकंड हाफ युद्ध को आगे बढ़ाता है। जल, थल और वायुसेना की लड़ाइयों से रोमांच आगे बढ़ता है। फिल्म में वॉर का पोर्शन काफी लंबा है और कुछ दृश्यों को और ज्यादा संवारा जा सकता था।
सनी देओल की स्क्रीन प्रेजेंस, थंडरस डायलॉग डिलीवरी और इमोशनल डेप्थ (खासकर बेटे की लॉस वाली सीन में) ने कई लोगों को नॉस्टैल्जिया और गर्व से भर दिया। दिलजीत दोसांझ के एयर फ़ोर्स के एरियल कॉम्बैट अच्छे लगे। वरुण धवन ने मैच्योर और इमोशनल परफॉर्मेंस दी, अहान ने भी कुछ सीन में अच्छा इम्पैक्ट छोड़ा।
पुराना गाना ‘घर कब आओगे’ नया पैट्रियॉटिक एंथम बन गया लगता है। फौजियों के परिवार के लोगों के अलग-अलग रोल में मोना सिंह, मेधा राणा, सोनम बाजवा के पास कुछ करने को था नहीं।
पुरानी ओरिजिनल बॉर्डर से ग्रिट, रियलिज्म और इमोशनल डेप्थ में बॉर्डर 2 पीछे है। पुरानी बॉर्डर ज्यादा रॉ लेकिन ऑथेंटिक लगती है, जबकि बॉर्डर 2 ज्यादा कमर्शियल, लाउड और मल्टी-स्टार है।
लेकिन फिर भी देखनीय है दो नंबर की बॉर्डर! बॉर्डर 2.

Ardhendu Bhushan (Consulting Editor)
Ardhendu Bhushan (Consulting Editor)http://www.hbtvnews.com
Ardhendhu Bhushan is a senior consulting editor with extensive experience in the media industry. He is recognized for his sharp editorial insight and strategic guidance.

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