मध्य प्रदेश के 30 साल पुराने 300 रुपए की रिश्वत केस में हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। इस फैसले में कोर्ट ने आरोपी पटवारी को बरी करते हुए राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया। यह मामला खुरई के पटवारी मुन्ना लाल पर रिश्वत लेने के आरोप से जुड़ा है, जो तीन दशक पुराना है।
30 साल पुराना रिश्वत मामला और कोर्ट का निर्णय
सागर जिले के खुरई क्षेत्र में 17 अक्टूबर 1996 को पटवारी मुन्ना लाल पर 300 रुपए की रिश्वत लेने का आरोप लगा था। शिकायतकर्ता वीर सिंह की ओर से लोकायुक्त पुलिस ने रंगे हाथों आरोपित को पकड़ा था। जिला न्यायालय ने दिसंबर 1997 में मुन्ना लाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। इसके बाद मध्य प्रदेश सरकार ने जबलपुर हाई कोर्ट में 1998 में अपील दायर की। यह अपील करीब 28 वर्षों तक लंबित रही।
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हाई कोर्ट ने रिश्वत मामले में क्या कहा?
सितंबर 2026 में जस्टिस संजय एस. कलगांवकर की एकलपीठ ने इस मामले में फैसला सुनाया। कोर्ट ने निचली अदालत के बरी करने वाले आदेश को सही ठहराते हुए सरकार की अपील खारिज कर दी। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रंगे हाथों पकड़े गए नोटों की बरामदगी से भ्रष्टाचार साबित नहीं होता। रिश्वत की अवैध मांग को बिना शक के सिद्ध करना आवश्यक है।
शिकायतकर्ता के बयानों में विरोधाभास से मामला कमजोर
कोर्ट ने देखा कि शिकायतकर्ता वीर सिंह के बयानों में विसंगति थी। उन्होंने अलग-अलग मौकों पर रिश्वत की मांग की राशि 450 और 500 रुपये बताई, जबकि रंगे हाथ पकड़े गए नोट मात्र 300 रुपए के थे। यह विरोधाभास अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर करता है।
पटवारी के बचाव में क्या तर्क सामने आया?
पटवारी के वकील ने अदालत को बताया कि शिकायतकर्ता के ऊपर पहले से 325 रुपये सरकारी राजस्व बकाया था। पकड़ी गई राशि उस सरकारी शुल्क के भुगतान के लिए थी, न कि रिश्वत के रूप में। इस तर्क को कोर्ट ने गंभीरता से लिया और मामले की जांच में यह पक्ष महत्वपूर्ण माना।
इस फैसले का आम जनता पर क्या प्रभाव होगा?
यह फैसला भ्रष्टाचार के मामलों में सबूतों की अहमियत को रेखांकित करता है। अदालत ने कहा कि भ्रष्टाचार के आरोपों में सटीक और स्पष्ट प्रमाण आवश्यक हैं। इससे आम आदमी को न्याय मिलने की संभावना बढ़ेगी और फर्जी या कमजोर मामलों से बचाव होगा।
अब आगे क्या हो सकता है?
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद ऐसे पुराने मामलों की जांच और फैसलों पर भी नजर रखी जाएगी। यह फैसला निचली अदालतों के निर्णयों की समीक्षा में एक मिसाल बनेगा। वहीं, भ्रष्टाचार मामलों में सबूतों की गुणवत्ता पर भी जोर दिया जाएगा।



