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इंदौर। काफी लंबे समय बाद इंदौर में कांग्रेस सड़कों पर दिखी। नगर निगम के भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन में कांग्रेस ने पूरा ताकत झोंकी। वाटर कैनन के बीच नारेबाजी करते कार्यकर्ताओं को देख ऐसा लगा कि इंदौर में कांग्रेस जिन्दा भी है। इंदौर की जनता को भी कांग्रेस के इस रूप का इंतजार था, लेकिन इसके पीछे की कहानी कुछ और ही है।
दरअसल, जब से जीतू पटवारी ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला है, पार्टी का पूरी तरह से बंटाढार हो गया है। विधानसभा चुनाव से पहले ही कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो गए थे। यह सिलसिला अब तक जारी है। इसका कारण पटवारी की अकड़ और खुद को प्रदेश का सबसे बड़ा नेता समझने का भ्रम है।
खैर, चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह हार हुई। इसके बाद भी पटवारी की आदतों में कोई सुधार नहीं हुआ। प्रदेश तो क्या वे इंदौर में भी अपनी पकड़ नहीं बना पा रहे थे। लोकसभा चुनाव में वे अपनी पार्टी के ही उम्मीदवार तक को बचा नहीं पाए और भाजपा ने उसका ‘अपहरण’ कर लिया। इससे पार्टी की पूरे देश में ही किरकिरी हुई।
इसके बाद पटवारी अपनी ही पार्टी में मौजूद नेताओं व विधायकों के निशाने पर आने लगे। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार भी पटवारी को बार–बार आईना दिखाने से बाज नहीं आते। कांग्रेस कार्यालय पर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के स्वागत के मामले में सिंगार और कुछ अन्य नेताओं के दबाव में ही निलंबन का नोटिस जारी हुआ। कई कांग्रेस नेता खुलेआम पटवारी पर इंदौर के भाजपा नेताओं से सांठगांठ का आरोप लगा चुके हैं।
आज के प्रदर्शन से पटवारी ने अपनी ही कुर्सी सुरक्षित रखने की कोशिश की है। किस्मत से उनके हाथ मौका भी लग गया। अभी प्रदेश कांग्रेस में काफी पदों का बंटवारा होना है। निलंबन का नोटिस झेल रहे शहर कांग्रेस अध्यक्ष सुरजीत सिंह चड्ढा और जिला अध्यक्ष सदाशिव यादव के पास भी अपनी ताकत दिखानी थी। नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष भी ऐसे किसी मौके की तलाश में थे। इन सब ने मिलकर आज के प्रदर्शन की सफलता की कहानी लिख दी। सज्जन सिंह वर्मा जैसे नेताओं के तीखे भाषण और पुलिस द्वारा की गई पानी की बौछार ने इसमें चार चांद लगा दिए।
इस प्रदर्शन के बाद भी कांग्रेस में सबकुछ ठीक हो जाएगा, ऐसा कहना मुश्किल है। इसके लिए पटवारी को अपने राहुल गांधी वाले चोले से बाहर आना होगा…



