जब से अमेरिका-इजराइल का ईरान से युद्ध शुरू हुआ है, तब से देश में एलपीजी सिलेंडर का संकट है। सरकार लगातार मना कर रही है, लेकिन संकट कम होने का नाम नहीं ले रहा। रसोई गैस के भी नियम हर दिन बदल रहे हैं, जिससे परेशानी थोड़ी कम हुई है, लेकिन कमर्शियल सिलेंडर को लेकर अभी भी गफलत की स्थिति है।
कमर्शियल सिलेंडर के लिए जहां होटल-ढाबे-रेस्टोरेंट वाले परेशान हैं, उनसे ज्यादा परेशानी कैटरर्स को हो रही है। आने वाले दिनों में लगातार शादियां हैं। कैटरर्स कह रहे हैं कि उन्हें कमर्शियल सिलेंडर नहीं मिल रहा। कई कैटरर्स तो आइटम कम करना का कह रहे हैं, लेकिन बड़े कैटरर्स ज्यादा पैसे मांग रहे हैं। बड़े कैटरर्स का कहना है कि उन्हें ब्लैक में ढाई-तीन हजार में सिलेंडर लेना पड़ रहा है।
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यहां बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार और प्रशासन की तरफ से इतनी सख्ती है और सप्लाई व्यवस्था भी दुरुस्त है तो फिर ब्लैक में सिलेंडर कैसे मिल रहे। आखिर वह कौन है जो प्रशासन के सख्त सिस्टम को भेद कर सिलेंडर बाहर ला रहा है। ऐसी ही शिकायत घरेलू रसोई गैस सिलेंडर को लेकर भी आ रही है। फिर सच्चाई क्या है?
खास बात यह कि ऐसी परेशानी सिर्फ आम लोगों को ही आ रही है। किसी भी वीआईपी के यहां आयोजन में कोई परेशानी नहीं है। वहां न तो कैटरर्स आइटम कम करने का कह रहे और न ही ब्लैक में सिलेंडर मिलने की बात सामने आ रही है। आखिर वीआईपी के यहां आयोजनों में सिलेंडर कौन पहुंचा रहा है?
सरकार हर बार दावा करती है कि सब कुछ ठीक है, लेकिन आम आदमी की चिन्ता उसे शायद ही है। कोराना के समय भी आम आदमी की ही बुरी गत बनी थी। अब भी गैस सिलेंडर के कारण उद्योंगों से लेकर मजदूरों तक पर असर पड़ा है।
अब तो सच बोल दो सरकार। आखिर माजरा क्या है?
अगर सबकुछ ठीक है तो ऐसी परेशानी क्यों? और अगर आपका सिस्टम ठीक काम कर रहा है तो ब्लैक में सिलेंडर खरीदने की नौबत क्यों?
आपको आम आदमी ने चुना है। कम से कम इस बार तो उसका ख्याल रख लो।



