दिल्ली उच्च न्यायालय ने महिला पत्रकार के खिलाफ जांच पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। यह फैसला 27 अक्टूबर 2026 को न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा की एकल पीठ ने सुनाया। इस मामले में महिला पत्रकार और उनके सहयोगी के खिलाफ दिल्ली पुलिस की जांच जारी है, जिसे अदालत ने फिलहाल रोकने से मना कर दिया है।
जांच रोकने की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला
इस मामले में महिला पत्रकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता तनवीर अहमद मीर ने अदालत से जांच पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की थी। हालांकि, दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि जब तक पुलिस और शिकायतकर्ता का जवाब नहीं मिलता, तब तक जांच पर रोक नहीं लगाई जा सकती। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 16-17 नवंबर 2026 के लिए निर्धारित की है।
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शिकायत और एफआईआर के मुख्य तथ्य
यह मामला दिल्ली पुलिस के सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) विवेक भगत की शिकायत पर दर्ज किया गया है। उन्होंने 3 अक्टूबर 2026 को जंतर-मंतर के पास हुए प्रदर्शन के दौरान महिला पत्रकार पर जातिसूचक टिप्पणी करने, ड्यूटी में बाधा डालने और सार्वजनिक अपमान करने का आरोप लगाया है। एफआईआर नई दिल्ली के संसद मार्ग पुलिस स्टेशन में दर्ज हुई है।
पत्रकार की याचिका और ACP पर यौन उत्पीड़न का आरोप
महिला पत्रकार ने ACP विवेक भगत पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए एक पृथक शिकायत दर्ज कराई है, जिसकी जांच दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच कर रही है। पत्रकार का तर्क है कि उनके खिलाफ दर्ज FIR केवल उन्हें डराने-धमकाने और प्रतिशोध के तहत की गई है। अदालत ने इस पक्ष को भी नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
कोर्ट का रुख और अगली सुनवाई की तैयारी
न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि फिलहाल वे किसी भी पक्ष की याचिका को खारिज नहीं कर रही हैं, बल्कि नोटिस जारी कर मामले का संपूर्ण पक्ष सुनना चाहती हैं। अदालत ने दोनों पक्षों को 16 नवंबर तक अपना जवाब दाखिल करने और अगली सुनवाई के लिए तत्पर रहने का निर्देश दिया है।
एससी/एसटी एक्ट और इसके प्रावधानों का महत्व
इस मामले में एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए हैं, जो समाज के अल्पसंख्यक वर्गों की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं। इस अधिनियम के तहत जातिसूचक टिप्पणी करना अपराध माना जाता है। इसलिए, जांच जारी रहना आवश्यक है ताकि आरोपों की निष्पक्ष जांच हो सके।



