Harish Fatehchandani

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Harish Fatehchandani is a dedicated journalist with over a decade of experience in the media field. He is respected for his consistent and honest reporting.

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भाजपा महामंत्री गौरव रणदिवे करेंगे दतिया में हार की जांच, सीएम आवास पर हुई समीक्षा, भीतरघात करने वालों पर होगा एक्शन

दतिया उपचुनाव में हार के बाद भाजपा अब इसके कारणों की पड़ताल में जुट गई है। सीएम आवास पर मंगलवार को इसकी समीक्षा के लिए बैठक बुलाई गई, जिसमें प्रदेश अध्यक्ष सहित कई बड़े नेता शामिल हुए। भाजपा ने हार के कारणों की जाच के लिए दो सदस्यीय कमेटी बनाई है, जिसमें महामंत्री गौरव रणदिवे और वरिष्ठ नेता अंबाराम कराड़ा को शामिल किया गया है।

किसी मुगालते में मत रहना दद्दा, दतिया में आपने भाजपा को नहीं हराया!

दतिया उपचुनाव में भाजपा की बुरी तरह हार हुई है और कांग्रेस ने यहां कब्जा बरकरार रखा है। अब लोग भले ही कह रहे हों कि दद्दा यानी की पिछली विधानसभा में कांग्रेस से हारे पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं देने के कारण भाजपा का यह हाल हुआ है, लेकिन इसके कारण अनेक हैं। जरा सोचिए कि आखिर पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा की लहर के बाद भी खुद को सीएम मटेरियल समझने वाले नरोत्तम मिश्रा चुनाव कैसे हार गए? और जब हार गए तो उसके बाद दतिया की जनता के लिए क्या किया? यह तो सबको पता है कि दद्दा का टिकट दिल्ली से कटा था और इसमें पीएम नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सहमति थी। टिकट कटने का कारणों में दद्दा पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप, लोगों से खराब व्यवहार और सीएम की सवारी जैसे कई कारण शामिल हैं। जब बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा यानी उपचुनाव की नौबत आ गई, तब दद्दा फिर से ताल ठोंकने लगे। इधर, पार्टी ने मन बना लिया था कि इस बार दद्दा तो नहीं ही चलेंगे। दूसरी तरफ दद्दा खुद को भाजपा उम्मीदवार मानकर चुनाव प्रचार में भी जुट गए थे, जब टिकट कटा तो दद्दा के साथ ही समर्थकों ने भी आंखें तरेरी। दद्दा ने भी कोशिश की, लेकिन जब लग गया कि कुछ होने वाला नहीं है तो फिर भाजपा उम्मीदवार आशुतोष तिवारी के समर्थन में उतर गए। फिर भी दद्दा दिल से यह बात स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। तभी तो आशुतोष तिवारी के नामांकन में उनकी आंखों से आंसू निकल पड़े। लोग इसे दद्दा समर्थकों के लिए संदेश भी मानते हैं। बाहर से दद्दा भाजपा उम्मीदवार के समर्थन में दिखाई दे रहे थे, लेकिन अंदर ही अंदर एक आक्रोश की एक चिंगारी भी भड़क रही थी कि इस बार पार्टी आलाकमान को सबक सीखा ही देनी है। दतिया की इस हार से एमपी के दद्दा जैसे उन नेताओं की बांछें जरूर खिली होंगी, जिनसे पार्टी किनारा करना चाहती है। लेकिन, इससे पहले यह समझना होगा कि दतिया में हार की एकमात्र वजह दद्दा को टिकट देना नहीं है। दतिया दद्दा की थी ही नहीं। वो तो कांग्रेस के पास थी और कांग्रेस के पास रहने के दौरान दद्दा ने उस सीट को भाजपा का बनाने की कोशिश भी नहीं की। उल्टा गड्ढा ही खोदते रहे। ऐसे में दद्दा जैसे नेताओं के आंख तरेरने से कम से कम मध्यप्रदेश में भाजपा को डरने की जरूरत नहीं है। सच तो यह है कि ऐसे नेताओं के कारण ही कई विधानसभा क्षेत्रों में लंबे समय से मेहनत कर रहे कार्यकर्ता अब हताश हो रहे हैं। भाजपा को तो ऐसे सभी नेताओं को अब मार्गदर्शक मंडल में ही बिठा देना चाहिए और नए लोगों को मौका देना चाहिए। इससे जनता के बीच भी अच्छा संदेश जाएगा और भाजपा के जमीनी कार्यकर्ता भी संतुष्ट होंगे। खैर, भाजपा इस हार की समीक्षा में जुट गई होगी। प्रदेश अध्यक्ष ने खेल बिगाड़ने वालों के खिलाफ एक्शन का भी ऐलान कर दिया है। जाहिर है कुछ ऐसा होगा, जो आगे के लिए दद्दा टाइप नेताओं के लिए सबक साबित होगा।

प्रशांत किशोर ने तोड़ा भाजपा का घमंड, राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की पारंपरिक बांकीपुर सीट पर उड़ाया गर्दा

कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई नेताओं के चुनावी रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर ने भाजपा का घमंड तोड़ दिया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा जाने से खाली हुई बांकीपुर सीट से प्रशांत किशोर ने भाजपा के उम्मीदवार नीरज सिन्हा को करारी शिकस्त दी है।

क्या दतिया उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटना भाजपा को पड़ा भारी, कहीं फेल तो नहीं हो गया मोदी फॉर्मूला?

बिहार के बांकीपुर के बाद मध्यप्रदेश के दतिया में हुए उपचुनाव में भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। यहां पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटना दतिया के लोगों को रास नहीं आया और उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी को अपना समर्थन दे दिया। इस चुनाव में हार के बाद भाजपा आलाकमान को भी अपने जबरदस्ती थोपे गए फैसलों पर सोचना होगा।

अपने घर में ही कांग्रेस नेताओं का झगड़ा नहीं रोक पाए जीतू पटवारी, प्रदेश से कैसे खत्म करेंगे गुटबाजी?

मध्यप्रदेश में खंड-खंड कांग्रेस की कमान जब जीतू पटवारी को सौंपी गई थी, तब भी कई सवाल उठे थे। उस समय तक कांग्रेस के कई टुकड़े हो चुके थे और खुद जीतू पटवारी सहित अधिकांश नेता चुनाव हार चुके थे। कांग्रेस आलाकमान को उम्मीद थी कि पटवारी गुटबाजी खत्म कर प्रदेश में कांग्रेस को मजबूत करेंगे, लेकिन यहां हुआ बिल्कुल उल्टा।

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