दिल्ली हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को AI आधारित डीपफेक सामग्री से जुड़ा महत्वपूर्ण न्यायिक आदेश देते हुए उन्हें राहत प्रदान की है। इस मामले में कोर्ट ने AI तकनीक से निर्मित आपत्तिजनक वीडियो और पोस्ट्स को हटाने का निर्देश दिया है, जिससे रेखा गुप्ता की प्रतिष्ठा और पर्सनैलिटी राइट्स की सुरक्षा सुनिश्चित हुई है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने AI आधारित डीपफेक सामग्री पर आदेश दिया
दिल्ली हाईकोर्ट के एकल पीठ जस्टिस मनोज जैन ने 6 नवंबर 2026 को मामले की सुनवाई के बाद आम आदमी पार्टी (AAP) और उनके सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को AI आधारित डीपफेक सामग्री वाले छह URLs को तुरंत हटाने का आदेश दिया। इस याचिका में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने अपनी गरिमा और व्यक्तित्व अधिकारों की रक्षा के लिए कदम उठाया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजनीतिक आलोचना की सीमाएं होती हैं और किसी की गरिमा को नुकसान पहुंचाना स्वीकार्य नहीं।
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विवादित AI जनरेटेड सामग्री का स्वरूप और प्रभाव
इस विवादित सामग्री में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को असत्य और अपमानजनक रूप में शराब विक्रेता, हॉकर तथा डिलीवरी एजेंट के रूप में दिखाया गया, जिसे “हर हर रेखा, घर घर ठेका” नामक फर्जी योजना के साथ जोड़ा गया था। यह सामग्री AI तकनीक का उपयोग कर बनाई गई थी और सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही थी, जिससे मुख्यमंत्री की छवि को भारी नुकसान पहुंचने का खतरा था।
मुख्यमंत्री के वकील ने कोर्ट में की दलील
मुख्यमंत्री के वकील समीर रोहतगी ने अदालत में कहा कि AI-जनरेटेड डीपफेक सामग्री बेहद अपमानजनक और प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाली है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि तत्काल अंतरिम राहत नहीं दी गई तो मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को अपूरणीय क्षति होगी। कोर्ट ने इस दलील को गंभीरता से लिया और तत्काल प्रभाव से सामग्री हटाने का आदेश दिया।
कोर्ट ने राजनीतिक व्यंग्य और गरिमा के बीच संतुलन की बात कही
जस्टिस मनोज जैन ने आदेश में कहा, “लोकतंत्र में राजनीतिक व्यंग्य और आलोचना की सीमाएं होती हैं। व्यंग्य किसी की अंतरात्मा को ठेस पहुंचा सकता है, लेकिन इसे किसी व्यक्ति की गरिमा पर अपूरणीय घाव करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।” इस टिप्पणी से यह स्पष्ट हुआ कि कोर्ट राजनीतिक आलोचना की आज़ादी को मान्यता देते हुए भी व्यक्तिगत सम्मान और प्रतिष्ठा की रक्षा को प्राथमिकता देता है।
AI तकनीक और व्यक्तित्व अधिकारों की सुरक्षा का नया आयाम
यह मामला AI तकनीक से उत्पन्न सामग्री के कारण सामने आने वाली नई कानूनी चुनौतियों को उजागर करता है। सिंथेटिक मीडिया के इस युग में, व्यक्तित्व अधिकारों की सुरक्षा के लिए अदालत का यह आदेश एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। इससे भविष्य में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर झूठी और भ्रामक सामग्री के प्रसार पर नियंत्रण की दिशा



