चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब देते हुए निर्णय प्रक्रिया में सभी चुनाव आयुक्तों की राय लेने की बात स्पष्ट की है। आयोग ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े तीनों आदेशों को सर्वसम्मति से लिए जाने का हवाला दिया है। इस जवाबी हलफनामे में आयोग ने आरोपों का खंडन करते हुए बताया कि कोई भी फैसला एकतरफा नहीं होता।
सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग का जवाबी हलफनामा दाखिल
26 अक्टूबर 2026 को भारत निर्वाचन आयोग ने उप चुनाव आयुक्त भानु प्रकाश येथुरु के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल किया। इसमें आयोग ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े तीनों आदेश—24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026—तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से लिए गए थे।
👉 यह भी पढ़ें:
- एयरपोर्ट पर रोके जाने पर भड़के भगंवात मान ने कहा- चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के भाई हैं कस्टम चीफ
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अदालतें चुनावों में न्याय के लिए चुप नहीं रह सकतीं
- सुप्रीम कोर्ट की हाई पावर कमेटी ने जंतर-मंतर हिंसा की जांच के लिए लॉन्च किया पोर्टल
- एमपी-यूपी समेत 17 राज्यों में वोटर लिस्ट अपडेट की तैयारी, SSR शेड्यूल बाद में जारी
- सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: धर्म परिवर्तन पर आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा
- अभिजीत दीपके ने INDI गठबंधन के प्रदर्शन का किया समर्थन, कहा देश को एकजुट होना होगा
यह हलफनामा मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की तीन सदस्यीय पीठ ने 5 अक्टूबर 2026 को जारी नोटिस के जवाब में प्रस्तुत किया गया था। आयोग ने बताया कि यह हलफनामा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी की संयुक्त स्वीकृति से तैयार किया गया।

निर्णय प्रक्रिया में सभी आयुक्तों की साझा राय आवश्यक
चुनाव आयोग ने कोर्ट को बताया कि किसी भी फाइल पर विचार-विमर्श के दौरान आयुक्तों या अधिकारियों की टिप्पणियां, सुझाव या भिन्न मत अंतिम निर्णय नहीं होते। ये सभी प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जिनके बाद अंतिम फैसला सर्वसम्मति से लिया जाता है।
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि फाइल पहले एक आयुक्त के पास जाती है, फिर दूसरे आयुक्त और अंत में मुख्य चुनाव आयुक्त के पास। आवश्यकता पड़ने पर इलेक्ट्रॉनिक मंजूरी भी ली जाती है, जिसे फाइल पर दर्ज किया जाता है। इस प्रक्रिया में सभी आयुक्तों की सहमति अनिवार्य होती है।
फॉर्म 6 में बदलाव के आरोपों का खंडन
मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले वैधानिक फॉर्म 6 को लेकर आयोग ने कहा कि इसमें कोई संशोधन नहीं किया गया है। आयोग ने बताया कि फॉर्म 6 में बदलाव का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।
हालांकि, ऑनलाइन आवेदन प्रणाली में फॉर्म 6 और घोषणापत्र को अलग-अलग दिखाने की व्यवस्था की गई है, जिससे भ्रम हो सकता था। लेकिन यह दस्तावेज़ों का अलगाव वास्तविक फॉर्म में भी मौजूद रहता है।
मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया पर सफाई
आयोग ने बताया कि जिन मतदाताओं का पुराना रिकॉर्ड वर्तमान सूची से मेल नहीं खाता, उन्हें सुनवाई के लिए आमंत्रित करने की आवश्यकता नहीं होती। बूथ स्तर के अधिकारी उनके घर जाकर दस्तावेज़ जुटाते हैं।
सुनवाई केवल विशेष मामलों में होती है, जिसमें ऑनलाइन सुनवाई को प्राथमिकता दी जाती है। मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने के लिए निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी के आदेश की आवश्यकता होती है।
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ लगाए गए आरोपों का जवाब
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अन्य आयुक्तों के विरोध के बावजूद कई एकतरफा निर्णय लिए। चुनाव आयोग ने इसे पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि ऐसे आरोप केवल मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं।
आयोग ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती क्योंकि यह सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने जैसी प्रक्रिया है।



