मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार सहित चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। इस याचिका में नियुक्ति प्रक्रिया और आयोग की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
याचिका में नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवाल
सूरी पसाला द्वारा दायर याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को कानून के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने ‘क्वो वारंटो’ रिट के जरिए इन नियुक्तियों को रद्द करने की मांग की है।
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याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 5, 6 और 8(1) के तहत नियुक्ति प्रक्रिया का उल्लंघन बताया गया है। इस प्रक्रिया के तहत सर्च कमेटी को हर रिक्ति के लिए पांच नाम सुझाने होते हैं, लेकिन मार्च 2024 में केवल छह नाम सुझाए गए थे, जो नियमों के खिलाफ है।

अधिसूचनाओं को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में मामला
याचिका में 14 मार्च 2024 और 17 फरवरी 2025 को जारी अधिसूचनाओं को चुनौती दी गई है। इन अधिसूचनाओं के तहत ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य दो को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था।
साथ ही याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि नियुक्ति के दौरान सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों को नजरअंदाज किया गया है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
मुख्य चुनाव आयुक्त के एकतरफा फैसलों पर विवाद
शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की एक अलग याचिका में यह आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक फैसले लिए।
अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच मतदाता सूची से जुड़े फैसलों पर अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां दरकिनार की गईं। इस तरह के एकतरफा निर्णय आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने निलंबन की मांग को ठुकराया
5 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने याचिकाकर्ताओं की मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने या उनके कामकाज पर रोक लगाने की मांग को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका केवल मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर कड़े आदेश नहीं दे सकती। इस फैसले ने आयोग के शीर्ष नेतृत्व को फिलहाल राहत दी है, लेकिन मामले की जांच जारी रहेगी।
कोर्ट ने केंद्र और आयोग को दिया जवाबी हलफनामा पेश करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने एक सप्ताह के अंदर केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और नियुक्त चुनाव आयुक्तों से जवाब मांगा है। इसके साथ ही कोर्ट ने उन रिकॉर्ड को पेश करने को कहा है जो यह साबित करें कि निर्णय सर्वसम्मति या बहुमत से लिए गए थे।
यदि नियमों का उल्लंघन पाया गया तो कोर्ट उन फैसलों को रद्द भी कर सकती है। इससे चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और स्वतंत्रता पर बड़ा असर पड़ सकता है।



