7 अक्टूबर 2026 को भारतीय शेयर बाजार में रेपो रेट बढ़ने से बाजार में गिरावट दर्ज की गई। सेंसेक्स 429 अंक टूटकर 72,638 के स्तर पर बंद हुआ, जिससे निवेशकों में चिंता व्याप्त हो गई। इस गिरावट के पीछे भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट में वृद्धि का निर्णय मुख्य कारण रहा।
रेपो रेट में 0.25% की बढ़ोतरी और इसका अर्थ
भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी कर रेपो रेट को 5.25% से बढ़ाकर 5.50% कर दिया। इस निर्णय को RBI के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने घोषित किया। रेपो रेट बढ़ने का मतलब है कि बैंकों को RBI से कर्ज लेना महंगा हो गया है। इससे बाजार में पूंजी की आपूर्ति घट सकती है और ब्याज दरें बढ़ सकती हैं।
👉 यह भी पढ़ें:
- शेयर बाजार में लौटी तेजी, सेंसेक्स 2 दिन में लगभग 1100 अंक चढ़ा
- शेयर बाजार में जोरदार उछाल, सेंसेक्स 472 अंक बढ़कर 72,382 पर बंद
- 25 साल में पहली बार लगातार 8वें हफ्ते गिरा शेयर बाजार, जानिए कारण
- Metal-Pharma स्टॉक्स के दबाव से Sensex 48 अंक गिरा, Nifty 22620 पर बंद
- बीएसई-सेंसेक्स और एनएसई-निफ्टी में गिरावट, जानिए किन स्टॉक्स में आई तेजी
- सेंसेक्स 1124 अंकों की गिरावट के साथ बंद, निवेशकों को 8 लाख करोड़ का नुकसान
केंद्रीय बैंक ने अपना मौद्रिक रुख ‘न्यूट्रल’ से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ कर दिया है, जिसका अर्थ है कि महंगाई को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों में सतर्क बढ़ोतरी की जाएगी।

सेंसेक्स और निफ्टी में गिरावट के आंकड़े
7 अक्टूबर 2026 को सेंसेक्स 0.59% गिरकर 429 अंक टूटा और 72,638 पर बंद हुआ। वहीं, निफ्टी 0.76% यानी 173 अंक की गिरावट के साथ 22,603 के स्तर पर बंद हुआ। यह गिरावट मुख्य रूप से धातु, आईटी, ऑटो और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर के शेयरों में भारी बिकवाली की वजह से आई।
मौजूदा आर्थिक माहौल में निवेशकों की धारणा बदल गई है, जिससे बाजार में बेचवाली बढ़ी है।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली का असर
इसके पहले 6 अक्टूबर को विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने 2,961.30 करोड़ रुपये के शेयर बेचे थे। इस बिकवाली ने बाजार की कमजोरी को और बढ़ावा दिया। FII की बिकवाली से पूंजी प्रवाह में कमी आती है, जिससे बाजार पर दबाव पड़ता है।
विदेशी निवेशकों की यह प्रवृत्ति बाजार की अस्थिरता को दर्शाती है, जो रेपो रेट बढ़ने के बाद और तीव्र हो गई है।

पिछले मौद्रिक रुख की तुलना में अब क्या बदलाव?
पहले RBI का मौद्रिक रुख ‘न्यूट्रल’ था, जिसका मतलब था कि ब्याज दरों में किसी भी दिशा में बड़े बदलाव की संभावना कम थी। लेकिन अब ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ नीति अपनाई गई है, जिससे महंगाई नियंत्रण के लिए ब्याज दरों को सावधानीपूर्वक बढ़ाया जाएगा।
इस बदलाव का असर लंबी अवधि में उधार लेने की लागत पर पड़ेगा और इससे आर्थिक गतिविधियों में भी फर्क आ सकता है।
आम आदमी और निवेशकों पर इसका प्रभाव
रेपो रेट बढ़ने से आम आदमी के लिए होम लोन, कार लोन और अन्य कर्ज महंगे हो सकते हैं। इससे खर्चों में कटौती हो सकती है और उपभोग प्रभावित होगा। निवेशकों को भी शेयर बाजार में अस्थिरता का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उनकी बचत और निवेश प्रभावित हो सकते हैं।
ब्याज दरों में वृद्धि से मुद्रास्फीति पर नियंत्रण तो होगा लेकिन आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ सकती है।
आगे बाजार में क्या संभावनाएं हैं?
मौद्रिक नीति समिति की अगली बैठक तक बाजार की अस्थिरता बनी रह सकती है। यदि महंगाई में कमी नहीं आती है, तो RBI ब्याज दरों में और वृद्धि कर सकता है। निवेशकों को सावधानी बरतनी होगी और बाजार की स्थिति पर नजर रखनी होगी।
वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार में सुधार के लिए स्थिरता और सकारात्मक आर्थिक संकेत जरूरी हैं। फिलहाल, निवेशक सतर्क रहकर ही निर्णय लें।



