4 साल में कान्हा नेशनल पार्क में 30 बाघों का शिकार, फिर से गुलजार हुआ क्षेत्र

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कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में 4 साल में 30 बाघों का शिकार हुआ, जो इस क्षेत्र के इतिहास का एक महत्वपूर्ण तथ्य है। यह शिकार 1947 से 1951 के बीच विजयनगरम के महाराज कुमार द्वारा किया गया था। तब से लेकर अब तक कान्हा क्षेत्र ने विभिन्न बदलाव देखे हैं और आज यह फिर से गुलजार हो गया है।

कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में 30 बाघों का शिकार का ऐतिहासिक सच

1947 से 1951 के बीच कान्हा क्षेत्र में 30 से अधिक बाघों का शिकार हुआ था। विजयनगरम के महाराज कुमार ने इस क्षेत्र में बाघों को गोली मारकर उनका शिकार किया। यह घटना कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के इतिहास में एक काला अध्याय है। तब यह क्षेत्र पूरी तरह से शिकारगाह के रूप में प्रयोग होता था।

1933 से पहले कान्हा क्षेत्र शिकार के लिए स्वतंत्र था, लेकिन बाद में वन्यजीव संरक्षण की जरूरत को समझते हुए इसे राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया।

कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में बाघों का शिकार और संरक्षण

शिकारगाह से राष्ट्रीय उद्यान बनने की यात्रा

कान्हा क्षेत्र को 1 जून 1955 को राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया। इसके बाद वर्ष 1973 में इसे प्रोजेक्ट टाइगर के तहत बाघ अभयारण्य घोषित किया गया। इस परिवर्तन ने कान्हा क्षेत्र को वन्यजीव संरक्षण का प्रमुख केंद्र बना दिया।

इस बदलाव के बाद बाघों और अन्य वन्यजीवों की संख्या में धीरे-धीरे सुधार हुआ। साथ ही अवैध शिकार पर रोक के लिए कड़े कानून लागू किए गए।

बाघों की मौत का हालिया संकट और सुरक्षा उपाय

मई 2026 में कान्हा टाइगर रिजर्व में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) के कारण 6 से 8 बाघों की मौत हुई। इसमें एक बाघिन और उसके शावक भी शामिल थे। इस घटना ने वन विभाग को हाई अलर्ट पर ला दिया।

इस संक्रमण को रोकने के लिए पार्क के आसपास 1,400 से अधिक घरेलू कुत्तों को बूस्टर डोज लगाई गई। यह कदम बाघों में वायरस फैलने से रोकने के लिए जरूरी था।

कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में बाघों का शिकार और संरक्षण

मध्य प्रदेश में बाघों की मौतों का राष्ट्रीय रिकॉर्ड

वर्ष 2025 में मध्य प्रदेश में 55 बाघों की मौत दर्ज की गई, जो पूरे देश में सर्वाधिक थी। इसके पहले 2023 में भी 41 बाघों की मौत हुई थी, जिनमें से 8 मौतें सिर्फ कान्हा टाइगर रिजर्व में हुईं।

यह आंकड़े वन्यजीव संरक्षण के लिए चुनौतियों को दर्शाते हैं, लेकिन कान्हा क्षेत्र में संरक्षण प्रयासों ने स्थिति को बेहतर बनाने में मदद की है।

कान्हा नेशनल पार्क का भौगोलिक विस्तार और महत्व

कान्हा नेशनल पार्क मध्य प्रदेश के मंडला और बालाघाट जिलों में फैला हुआ है। इसका कुल क्षेत्रफल कोर और बफर जोन मिलाकर लगभग 1945 वर्ग किलोमीटर है।

यह क्षेत्र बाघों के लिए सुरक्षित आवास प्रदान करता है और बारहसिंगा, गौर जैसे अन्य वन्यजीव भी यहां पाए जाते हैं। पार्क का विस्तार वन्यजीवों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

कान्हा क्षेत्र का पुनरुद्धार और वन्यजीव संरक्षण की सफलता

कड़े वन कानूनों, अवैध शिकार पर रोक और निरंतर संरक्षण प्रयासों के चलते कान्हा क्षेत्र फिर से गुलजार हो गया है। बाघों की संख्या में सुधार हुआ है और री-वाइल्डिंग प्रशिक्षण एवं सुरक्षित कॉरिडोर निर्माण जैसे प्रोजेक्ट्स सफल रहे हैं।

इन प्रयासों से न केवल बाघों की संख्या बढ़ी है, बल्कि क्षेत्र की जैव विविधता भी मजबूत हुई है। कान्हा अब वन्यजीव प्रेमियों के लिए एक प्रमुख पर्यटन स्थल बन चुका है।

Abhilash Shukla (Editor)
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Abhilash Shukla is an experienced editor with over 28 years in journalism. He is known for delivering balanced, impactful, and credible news coverage.

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