बड़े पर्दे पर ओटीटी सीरीज जैसी है – ‘मिर्जापुर : द मूवी’

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-प्रकाश हिन्दुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार


बेहिसाब वायलेंस, उपेक्षित महिला पात्र, मर्दवादी हीरो, अडल्ट सर्टिफकेट, लम्बी फिल्म, गालियां और नंगापन फिल्मों का न्यू नार्मल है। फिल्म ‘मिर्ज़ापुर द मूवी’ में भी यही सब है। मिर्ज़ापुर की पहचान हिंसा, गालियों और सत्ता की क्रूरता से बनी है। फिल्म को ‘A’ सर्टिफिकेट मिला है और इसकी अवधि लगभग 197 मिनट है, लेकिन इसमें हिंसा का असर सिर्फ़ खून दिखाने से नहीं, उसके परिणाम दिखाने से पैदा होता है।

यदि किसी वेब सीरीज़ के मुन्ना भइया, गुड्डू पंडित और कालीन भइया को सिनेमाई परदे पर उतारा जाए, तो चुनौती केवल कहानी कहने की नहीं, उस ‘भौकाल’ को जस्टिफाई करने की होती है। ‘मिर्ज़ापुर : द मूवी’ इसी कशमकश और महत्वाकांक्षा का नाम है। फार्मूला वही है – पूर्वांचल की ज़मीन, कट्टे की गूंज और सत्ता की भूख फिल्म उसी फॉर्मूले पर सवार होकर थियेटर में आई है.

गुरमीत सिंह की पहली फीचर फिल्म, पुनीत कृष्णा की पटकथा, रितेश सिधवानी-फरहान अख्तर का प्रोडक्शन। पंकज त्रिपाठी कालीन भैया, अली फजल गुड्डू, दिव्येंदु मुन्ना, जितेंद्र कुमार बबलू और रवि किशन नया खतरा बनकर। राजेश तैलंग भी हैं जो क़ानून का जीवन जीना चाहते हैं और उनका बेटा कहता है कि ईमानदारी अजगर है, जो पापा पाने गले में लपेटे हैं, लेकिन उसमें दम हम सबका घुट रहा है।”

कहानी 2018 के आसपास घूमती है। पुराने दुश्मन लौटे हैं, नए दावेदार आए हैं, गद्दी के लिए खून बहना तय है। यह मूल सीरीज़ की कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय उसके पहले सीज़न के छठे और सातवें एपिसोड के बीच की एक अनकही कहानी दिखाती है यानी मुन्ना, गुड्डू और कलीन भैया जैसे किरदारों को फिर से दिखाया गया है

पंकज त्रिपाठी कालीन भइया के रूप में जैसे हमेशा ठंडे और खतरनाक हैं। दिव्येंदु का मुन्ना भैया वापस आया. अली फज़ल का गुड्डू भी अपनी जगह पर ठोस है। रवि किशन ने नया किरदार लिया है और थिएटर में उनकी एंट्री प्रभावी है। बड़े पर्दे पर एक्शन और हिंसा का स्केल सीरीज से बड़ा लगता है.जो लोग सीरीज के फैन हैं, उन्हें पुराने किरदारों को एक साथ देखकर संतोष होगा। बैकग्राउंड स्कोर और कुछ गाने माहौल बनाते हैं।

कहानी में ज्यादा नयापन नहीं है। वही गद्दी की लड़ाई, वही बाप-बेटे का तनाव, वही हिंसा और गालियां। सेंसर ने कुछ गालियां म्यूट की हैं, हिंसा लगभग वैसी ही रखी है। जो लोग सीरीज नहीं देख सके हैं, उनके लिए शुरुआत में उलझन हो सकती है। जो देख चुके हैं, उनके लिए बहुत कुछ दोहराव जैसा लगेगा।

सबसे बड़ी समस्या लंबाई है। 3 घंटे 17 मिनट। थियेटर में बैठकर इतना समय देना आसान नहीं। फर्स्ट हाफ में बहुत कुछ समझाने की कोशिश की गई है, जैसे दर्शक को सीरीज याद नहीं होगी। यह फिल्म कई जगह स्ट्रेच्ड वेब सीरीज जैसी लगती है, सिनेमाई फिल्म जैसी नहीं। जितेंद्र कुमार बबलू बने हैं, लेकिन विक्रांत मैसी की जगह भरना आसान नहीं था। कई दर्शक मूल बबलू को याद करते रहेंगे।

कुल मिलाकर यह फिल्म सीजन 1 जितनी ताजा नहीं है, लेकिन सीजन 2 और 3 से कुछ बेहतर मानी जा रही है। फैंस के लिए यह देखने योग्य है, खासकर बड़े पर्दे पर भौकाल का मजा लेने के लिए।

पुनीत कृष्णा की लिखी लाइनें चुटीली हैं और कुछ संवाद थियेटर से बाहर निकलने के बाद भी याद रहते हैं जैसे –

-“काबिल औलाद बहुत मुश्किल से मिलती है… और कभी-कभी नहीं भी मिलती।”

-“सारी प्रजा को मार देंगे, तो राज किस पर करेंगे?”

“गद्दी न तो विरासत से मिलती है, न सियासत से। मिलती है तो बाहुबल से… और टिकती है डर पे।”

-“बाहुबली मारते नहीं हैं, मारने का ऑर्डर देते हैं।”

-“खतरा चाहे जितना भी छोटा हो, उसे जीवित नहीं छोड़ सकते। यही गद्दी का नियम है।”

-“मिर्जापुर में एक ही दरवाजा है यादव जी, दूसरा नहीं खुलेगा।”

-“हमें एम्पायर चलाना नहीं है गुड्डू भैया… बनाना है।”

-“दूसरा दरवाजा नहीं खुलेगा, तो तोड़ देंगे।”

-“आप हिस्ट्री उठाकर देख लीजिए, जितने भी गैंगस्टर लोग एंबीशियस रहे हैं, सब साले टॉप पर पहुंचे हैं, नीचे से उठकर ऊपर गए है.

फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर तनाव को बनाए रखने में आधी जंग जीत लेता है।

जो हिंसा और लंबी कहानी नहीं पचा सकते, उनके लिए यह अझेलनीय है.

Ardhendu Bhushan - Consulting Editor
Ardhendu Bhushan - Consulting Editorhttp://www.hbtvnews.com
Ardhendhu Bhushan is a senior consulting editor with extensive experience in the media industry. He is recognized for his sharp editorial insight and strategic guidance.

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