नवभारत और राधे संस्था विवाद : पैसे के लेनदेन का रिकॉर्ड ही नहीं

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इंदौर। इन दिनों नवभारत गृह निर्माण संस्था और श्री राधे गृह निर्माण संस्था के बीच जमीन को लेकर विवाद चल रहा है। फिलहाल मामला सहकारिता विभाग के संयुक्त आयुक्त उज्जैन के पाले में है। इस मामले में बड़ा खुलासा यह है कि जिस जमीन के लिए राधे संस्था लड़ाई लड़ रही है, उसकी राशि नवभारत संस्था के किसी रिकॉर्ड में नहीं है।

अनुबंध में 50 लाख प्राप्त करने का जिक्र

उल्लेखनीय है कि यह अनुबंध 21 सितंबर 2004 को नवभारत गृह निर्माण संस्था तथा श्री राधे संस्था के बीच हुआ था। इसमें 70 हजार वर्गफुट के अनुबंध की बात लिखी गई है। अनुबंध में लिखा है कि 21-09-2004 को 50 लाख रुपए नकद प्राप्त हुए। इतना ही नहीं इसमें यह भी लिखा है कि 12 अक्टूबर 2004 को नकद 50 लाख रुपए और मिलेंगे। इसके बाद रजिस्ट्री के मय 60 लाख 50 हजार रुपए देने की बात लिखी गई है।

संस्था के किसी रिकॉर्ड में पैसे का जिक्र नहीं

सूत्र बताते हैं कि अनुबंध के अनुसार जिस राशि का जिक्र किया गया है, वह संस्था के किसी रिकॉर्ड में नहीं है। चूंकि दोनों ही सहकारी संस्थाएं हैं, उन्हें सारे नियम-कायदे मालूम हैं। जाहिर है कि सारा लेनदेन रिकॉर्ड पर ही हुआ होगा। लेकिन, नवभारत गृह निर्माण संस्था के किसी भी रिकॉर्ड में इतनी बड़ी राशि के लेनदेन का हिसाब मौजूद नहीं है। न ही ऑडिट में इसका कहीं जिक्र है।

इतनी बड़ी राशि के नकद लेनदेन पर सवाल

यहां बड़ा सवाल यह है कि कोई भी संस्था इतनी बड़ी राशि का लेनदेन नकद में नहीं करती। कोई भी व्यक्ति छोटा-मोटा प्लॉट भी खरीदता है तो कुछ पैसे नकद तथा कुछ चेक से अदा करता है। लेकिन, इस अनुबंध के मुताबिक सारी राशि के लेनदेन की बात नकद कही गई है।

संस्था के पुराने अध्यक्ष के नाम से अनुबंध

यह अनुबंध नवभारत गृह निर्माण संस्था के पुराने अध्यक्ष सुभाष दुबे और श्री राधे संस्था के अध्यक्ष मधुसूदन नीमा के बीच हुआ है। ऐसे में जब पैसे के लेनदेन का रिकॉर्ड नहीं मिल रहा तो सहकारिता विभाग को पहले नवभारत संस्था के पूर्व अध्यक्ष सुभाष दुबे पर कार्रवाई करनी चाहिए। एक और बात कि जिस अनुबंध के पैसे संस्था को मिले ही नहीं, उसके लिए ट्रिब्यूनल से लेकर जेआर तक की कोर्ट में सुनवाई क्यों हो रही है।

नवभारत ने रूपल संस्था से भी किया है अनुबंध

इस मामले में बड़ा खुलासा यह भी है कि नवभारत संस्था ने सिर्फ श्री राधे से ही नहीं बल्कि एक और संस्था रूपल गृह निर्माण से भी 21 हजार वर्गफुट की जमीन का अनुबंध किया है। इस तरह कु 91 हजार वर्गफुट की जमीन का अनुबंध हो चुका है, जबकि प्राधिकरण से नवभारत को मात्र 79 हजार वर्गफुट जमीन ही मिलनी है। अगर इन दोनों संस्थाओं के अनुबंध को सही भी मान लें तो बची हुई 11 हजार वर्गफुट जमीन कौन देगा?

सदस्यों की बजाए संस्था को कैसे मिलेगा प्लॉट

यहां एक बड़ा सवाल यह भी है कि नवभारत गृह निर्माण संस्था के 800 से ज्यादा सदस्य प्लॉट के लिए भटक रहे हैं। ऐसे में संस्था अपने सदस्यों को प्लॉट देने की बजाए दूसरे गृह निर्माण संस्था को कैसे जमीन देगी। वैसे भी एक संस्था को दूसरी संस्था को जमीन देना नियमों के विपरीत है।

अधिकारियों को सब मालूम, फिर भी चुप्पी

सूत्र बताते हैं कि इस संस्था के पूर्व प्रशासक तथा सहकारिता विभाग के अन्य अधिकारियों ने वरिष्ठों को पूरे मामले की जानकारी दे दी थी। अपील भी की गई, लेकिन किसी ने सुनी नहीं। मामला ट्रिब्यूनल से होकर एक बार फिर उज्जैन जेआर के पास पहुंच गया है।

भूमाफियाओं ने उज्जैन में कराई सेटिंग

सूत्र बताते हैं कि इस मामले को निपटाने के लिए भूमाफिया लंबे समय से शासन स्तर पर लगे हैं। एक रणनीति के तहत ही उज्जैन में अपने मनपसंद जेआर का ट्रांसफर कराया गया और अब केस भी वहीं ट्रांसफर कर दिया गया। इतना ही नहीं 13 अगस्त को इसका फैसला भी हो जाएगा और सूत्र कह रहे हैं कि एक बार फिर नवभारत की हार होगी।

Harish Fatehchandani
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