नई दिल्ली। Gen-Z से संवाद कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने जो कुछ भी कहा है उसके कई मायने निकलते हैं। कुछ लोग कह रहे हैं कि वे सरकार की आलोचना कर रहे हैं, वहीं कई लोगों का कहना है कि संघ प्रमुख का बयान युवाओं का गुस्सा ठंडा करने के लिए है। यह एक तरह से सरकार का सपोर्ट ही है।
संघ प्रमुख ने कहा कि आवाज नहीं सुनी गई तो प्रदर्शन कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि आंदोलन भी डायलॉग का ही एक तरीका है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध भी आम सहमति बनाने का एक तरीका है। कई तरह के विचार सामने आते हैं और बातचीत के बाद आम सहमति बनती है। यह बातचीत संवाद के जरिए हो सकती है। अगर अलग-अलग वजहों से बात नहीं सुनी जाती तो आंदोलन किया जा सकता है, लेकिन ऐसा आम सहमति बनाने के लिए किया जाना चाहिए, न कि बंटवारा करने के लिए।
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भागवत ने जेन जी की शिकायत को सही कहा
उन्होंने कहा कि हाल ही में Gen-Z ने जो शिकायत की है वो सही है। भारत की शिक्षा व्यवस्था में बहुत कुछ करने की जरूरत है और ऐसा नहीं हो रहा है इसलिए यह मुद्दा उठाया जा रहा है। Gen Z के बारे में मेरे अनुभव की बात करें तो जब हम उनकी उम्र के थे तो हम बड़ों की बात मान लेते थे, कभी सवाल नहीं उठाते थे। अब, Gen Z और Gen Alpha सवाल पूछते हैं, उन्हें तार्किक जवाब और प्यार चाहिए। लोकतंत्र में यही तरीका है। इसे अंग्रेजी में ‘डिबेट’ कहते हैं, हम इसे ‘शास्त्रार्थ’ कहते हैं – वहां कोई बहस नहीं होती, बल्कि दो पक्ष होते हैं- पूर्व और उत्तर।
प्रदर्शन करने वाला जेन जी देश विरोधी नहीं
छात्रों के विरोध-प्रदर्शन और प्रदर्शनकारियों को ‘देश-विरोधी’ कहे जाने पर RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, ‘अगर Gen Z विरोध कर रहा है तो वे देश-विरोधी नहीं हैं। वे हमारे ही लोग हैं, हमारी अगली पीढ़ी हैं। मुझे नहीं लगता कि Gen Z ऐसी है। मुझे लगता है कि नई पीढ़ी Gen Z और Gen Alpha हमारी मौजूदा पीढ़ी से ज्यादा ईमानदार है। देशभक्ति और सेवा की सच्ची अपील उन पर असर करती है।
आंख बंद कर जेन जी पर भरोसा करता हूं
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने ‘दुनिया को जोड़ने में युवाओं की भूमिका और भारतीय तरीका’ विषय पर बात की। उन्होंने कहा कि मैं आंख बंद करके जेन जी पर भरोसा करता हूं। मुझे जेन जी के बारे में अनुभव है, जब हम जेन जी थे तो हमारे पीढ़ी की स्वभाव था हम बात मानते थे सवाल नहीं करते थे। अब जेन जी अल्फा सवाल सवाल पूछते हैं।
फूट डालने के लिए नहीं होने चाहिए प्रदर्शन
लोकतंत्र और सहमति पर पर मोहन भागवत ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन भी सर्वसम्मति (आम सहमति) बनाने का एक तरीका है। जब कई तरह के विचार एक साथ आते हैं, तो चर्चाओं के बाद एक सहमति बनती है। वह चर्चा संवाद के माध्यम से हो सकती है। हालांकि, कई कारणों से यदि किसी चिंता या बात को सुना नहीं जाता है, तो व्यक्ति आंदोलन का रुख कर सकता है, लेकिन यह सभी कदम आम सहमति बनाने के लिए उठाए जाने चाहिए, न कि समाज में विभाजन (फूट) पैदा करने के लिए।
शिक्षा को समाज सेवा का माध्यम बनाना होगा
शिक्षा व्यवस्था को लेकर मोहन भागवत ने कहा कि शिक्षा को केवल कमाई का साधन या व्यावसायिक धंधा नहीं बनाया जाना चाहिए। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा समाज के हर वर्ग तक सुलभ होनी चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। समाज, शैक्षणिक संस्थानों और नागरिकों को भी इसमें सक्रिय भूमिका निभानी होगी ताकि हर बच्चे तक अच्छी शिक्षा पहुंच सके। उन्होंने शिक्षकों के लगभग 10 लाख रिक्त पदों का उल्लेख करते हुए शिक्षा पर सकल बजट का छह फीसदी खर्च किए जाने की लंबे समय से चली आ रही मांग का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि यह मांग उचित है और बिना आंदोलन के भी इसे हासिल किया जा सकता है।



