छिंदवाड़ा कांड: आखिर किसे बचाने में जुटा है आईएमए- क्या आपको पता नहीं किस दवा से कितना हो सकता है नुकसान, फिर भी कमीशन के चक्कर में ले रहे हो जान

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भोपाल। छिंदवाड़ा में जहरीले कफ सिरप से बच्चों की जान लेने वाले डॉक्टर प्रवीण सोनी के पक्ष में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन यानी आईएमए प्रदर्शन कर रहा है। संगठन के डॉक्टरों का कहना है कि इसमें प्रवीण सोनी की कोई गलती नहीं है, सारी गलती कंपनी की है। क्या, ये धरती के भगवान बता सकते हैं कि जब कोई एमआर इनके पास आता है तो वह दवा के बारे में पूरी जानकारी नहीं देता? क्या डॉक्टर को पता नहीं होता कि दवा के किस तत्व से इंसान के शरीर पर कितना नुकसान होता है?

दरअसल यह पूरा मामला कमीशनखोरी का है। जिस कंपनी ने जिस दवा के लिए ज्यादा कमीशन दिया, डॉक्टर की पर्ची पर वही दवा लिखी जाएगी। आईएमए को क्या यह पता नहीं है? ताज्जुब तो तब होता है कि जब डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवा उसके क्लिनिक या आसपास की दुकानों में ही मिलती है। पूरे शहर में घूम लीजिए, यह दवा कहीं नहीं मिलेगी। कई डॉक्टर तो इतना घसीटामार लिखते हैं कि दूसरी दुकान वाले उनकी दवा का नाम तक नहीं पढ़ पाते और कह देते हैं कि क्लिनिक के पास वाली दुकान पर चले जाइए।

सोनी की पत्नी ही चला रही थी मेडिकल स्टोर

छिंदवाड़ा के मामले ने डॉक्टरों की पर्ची पर लिखी जाने वाली दवा में होने वाले फर्जीवाड़े को और उजागर कर दिया है। जो जहरीली दवा डॉ.प्रवीण सोनी लिखते थे, वह उनकी पत्नी द्वारा संचालित दुकान से ही मिलती थी। इसका साफ अर्थ है कि कंपनी का कमीशन और दवा बेचने पर मिलने वाला कमीशन दोनों डॉ.सोनी की जेब में जा रहे थे। अब ऐसे डॉक्टर को आईएमए बचा कर क्या करेगा?

हॉस्पिटलों में भी कमीशन का चक्कर

छोटे से लेकर बड़े अस्पतालों तक में जो दवा लिखी जानी होती है, उसे वहीं के स्टोर से खरीदने को मजबूर किया जाता है। अधिकांश अस्पताल बाहर से दवा लाने को मना कर देते हैं। आखिर ऐसा क्यों किया जाता है। इसका कारण दवा पर मिलने वाला कमीशन ही है। अस्पताल द्वारा लिखी गई अधिकांश महंगी दवाएं बाहर की दुकानों में लगभग आधी कीमत में मिल जाती है, लेकिन अस्पताल उसे एमआरपी पर ही बेचते हैं। जाहिर है इसमें काफी ज्यादा कमीशन मिलता है।

खुद को पाक-साफ बताने से कुछ नहीं होने वाला

जब भी इस तरह के मामले होते हैं और डॉक्टरों पर कार्रवाई होती है, तब आईएमए उनके पक्ष में खड़ा हो जाता है। लेकिन, यही आईएमए कभी यह अस्पतालों और क्लिनिकों की व्यवस्था सुधारने की कोशिश नहीं करता। यही आईएमए ऐसी जहरीली दवा बनाने वाली कंपनियों की दवाओं का बायकाट कभी नहीं करता। बहुत सारी ऐसी कंपनियां हैं, जिनकी दवाएं कभी न कभी ब्लैक लिस्टेड हुई हैं, लेकिन उनके दूसरे प्रोडक्ट इन्ही डॉक्टरों की पर्चियों पर खुलेआम बिकते हैं। विडंबना तो यह कि कई ब्लैक लिस्टेड दवाएं भी डॉक्टरों के क्लिनिक से मरीजों तक पहुंच जाती हैं। इसलिए सिर्फ खुद को पाक-साफ बताने से कुछ नहीं होने वाला, अगर धरती के भगवान का दर्जा बरकरार रखना है तो आचरण भी वैसा ही करना होगा।

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